December 17, 2014

एक अदद रजाई
पाकिस्तान को कश्मीर चाहिए, चीन को अरुणाचल प्रदेश चाहिए, अमेरिका को अपनी जेब में दुनिया चाहिए, दुनिया को मुक्ति चाहिए, समाजवादियों को अपना परिवार चाहिए, परिवार को सत्ता चाहिए, कांग्रेस को गुजरे दिन चाहिए, भाजपा को समूचा देश चाहिए, देश को अच्छे दिन चाहिए, अच्छे दिनों को पता चाहिए, मंत्रियों को विवादित बयान चाहिए, बॉलीवुड को चंद हिट चाहिए, क्रिकेट टीम को ऑस्ट्रेलिया में जीत चाहिए, जनता को काम चाहिए, काम को बाबू चाहिए, बाबुओं को आराम चाहिए, छुट्टी भरे दिन चाहिए, दिन को सूरज चाहिए, सूरज को ताप चाहिए, रातों को सुकून चाहिए और इन सबसे परे मुझे एक अदद रजाई चाहिए! इस समय सब चीजें भुलाकर मैं एक अदद रजाई का तलबगार हूं। गोया मौसम ने अपनी ठंड से भरी मिसाइलें चारों ओर तैनात कर दी हैं और लगातार आक्रमण तन-मन को भेद रहे हैं। जर्रे-जर्रे ने ठंड को फैलाने की, मुझे गलाने की साजिश की है। घबराकर मैं बंकर में घुस जाना चाहता हूं। इस समय रजाई से बेहतरीन, सुरक्षित, मजबूत बंकर कोई नहीं। सारी कायनात एक तरफ, रजाई की करामात एक तरफ। सारी सक्रियता को ठंड लग गई है। दिमाग दही सा जम गया है। सोचने-समझने की शक्ति क्षीण हो रही है। छातियां बूझे चूल्हों की तरह ठंडी पड़ी हैं, जिन्हें सुलगाए रखने के लिए 'आग' चाहिए। कहीं से बीड़ीजलाऊ आह्वान भी नहीं कि 'जिगरवा में बड़ी आग' है। दांत गिटार से बज रहे हैं। मुंह इंजन बन गए हैं, भाप का उत्सर्जन जारी है। नाक सदानीरा है। हड्डियों में हलचल नहीं है। मौसम का सितम ऐसा है कि खून का खुद को खून बनाए रहना इस समय सबसे बड़ी चुनौती है, उसे ऑक्सीजन से ज्यादा गर्माहट की सप्लाई चाहिए। ऐसे में रजाई का आविष्कार बड़ी क्रांतिकारी घटना लगती है।
ऐसे माहौल में जिसके पास एक अदद रजाई हो और बंदा उसमें घुसा पड़ा हो, वह दुनिया का सबसे बड़ा सूरमा है। मुझे तो ऐसे सूरमा के लिए नारा भी सूझ रहा है- दाल, बाटी, चूरमा - रजाई वाला सूरमा। सूरमा ही होगा, क्योंकि रजाई में घुसा हुआ व्यक्ति किस्मत का सांड होता है। फिल्मी डायलॉग में कहें तो वह तो पूरा सलमान खान हो जाता है, जो अपने आप की भी नहीं सुनता। और जिनके पास रजाई नहीं, वे सबकी सुनने को मजबूर हैं, विवश हैं, अभिशप्त हैं। उन्हें हर कोई सुनाता है, वे सुनते हैं। कांपते बदन में इतना भी हरकत नहीं होती कि वे खुद को सुनने से मुक्त करने का यत्न कर सकें।
उनकी यह बात समझ से परे है कि कुछ लोग क्यों जेड सुरक्षा के लिए हाय-तौबा मचाते हैं। इस समय जिसे रजाई मिल जाए, उसे और क्या चाहिए। सरकार चाहे तो रजाई विहीनों को यह जेडनुमा सिक्योरिटी देने का ऐलान कर सकती है। इसे अच्छे दिनों की डिलीवरी भी करार दिया जा सकता है। बिना रजाई के सारी बहादुरी बर्फ की तरह जमती है, जरा से ताप से रूई के फाहों की तरह उड़ जाती है। इसलिए लोगों को सब कुछ छोडक़र इस समय रजाई पर फोकस करना चाहिए। सारी दूसरी मांगें छोडक़र रजाई की मांग करनी चाहिए। जरूरत पड़े तो एक 'रजाई संघ ' बनाया जा सकता है। जिसका काम रजाई विहीन लोगों को चिन्हित करना, उनकी मांग उचित मंचों पर उठाना और उन्हें रजाई सम्पन्न बनाना हो। हालांकि अंदेशा यह भी है कि संघ को रजाइयां प्राप्त होते ही वे उसमें घुस जाएंगे, और जरा सी गर्माहट हासिल होते ही अपनी मांग की धार खो देंगे। धीरे-धीरे नैतिक बल भी जाता रहेगा। जिनको अभी तक गरीबी रेखा से बाहर नहीं निकाला जा सका, उन्हें रजाई के भीतर तो धकेलना सरकार की प्राथमिकता होना चाहिए।
यदि जीवन कविता की एक किताब हो, तो इस समय इसका शीर्षक यही होगा- मुझे रजाई चाहिए। जिनके पास रजाई नहीं, उनका दर्द गुरुदत्त के दर्द के लेवल का होता है कि 'यह दुनिया गर भी जाए तो क्या...?'

December 11, 2014

सलाम पालीवाल सर!

अगर आपसे पूछा जाए कि वह क्या है, जो सर्दी, गर्मी, वर्षा किसी भी प्रतिकूल मौसम में किसी भी सूरत में नहीं रुकता...? तो मौजूं वक्त के हिसाब से हो सकता है कुछ लोग रेडियो पर आने वाले मोदी के संबोधन से लेकर विदेश दौरे, अच्छे दिन गिनाएं या अपने-अपने नजरिए से कुछ भी गढऩे लगें, लेकिन मेरी नजर में वह एक शिक्षक हैं, जिन्हें लोग शशि पालीवाल जी के नाम से जानते हैं। वे प्रतिदिन जयपुर से 50 किमी का सफर तय कर स्कूल पहुंचते हैं।
स्कूल जयपुर-लालसोट रोड (जिला दौसा) पर एक आदिवासी बहुल गांव में है, जिसके पास अपने कोई संसाधन नहीं, पर्याप्त बिल्डिंग नहीं, खेल मैदान नहीं, शौचालय नहीं, सबसे जरूरी पढ़ाई का माहौल नहीं...शक्लोसूरत ही नहीं, 'कैरेक्टर' से भी पूरा प्राइमरी स्कूल और गत वर्ष चुनावी चकल्लस में जिसकी मांग में सैकंडरी का सिंदूर भर दिया गया। अब जबरन क्रमोन्नति के भरे गए इस सिंदूर का दर्द कोई सरकार क्या जाने?
खैर, कुल पांच कमरों और दस क्लास वाली स्कूल में मेरी पत्नी को हैडमास्टर लगाया गया। वे साल भर से उसे एक स्तर तक लाने के लिए जूझ रही हैं। 'स्कूल की दशा सुधार कर रहेंगे' का बड़ा अरमान और जोशीला संकल्प लेकर हमने जयपुर रहने के मोह का परित्याग किया और बोरिया बिस्तर उठा गांव में ही रहने चले आए। यहां आकर पता चला कि स्कूलों को सुधारना कोई 'बिग बॉस' के घर का टास्क नहीं, शेरों के खुले पिंजरे में कूद जाने से कम नहीं।
इससे हमें यह फायदा जरूर हुआ कि हम तय समय पर स्कूल पहुंचकर अन्य शिक्षकों पर नैतिक दबाव बनाने की स्थिति में आ गए। हालांकि नैतिक दबाव जैसी किसी काल्पनिक चीज में भरोसा करने वाले यह जानकर बेहोश हो सकते हैं कि नित्यप्रति की लेटलतीफी, बहानों की अंतहीन शृंखला, जल्दी जाने की धुन, क्लास तक न जाने की जहमत, छुट्टी मारकर साइन करने के लिए बच्चों की तरह रूठना-मनना और बच्चों का भविष्य नेस्तनाबूद करने की जिद हो, वहां मरी आत्माओं में ठोकरों से भी कोई हलचल नहीं होती, नैतिक दबाव तो दूर की बात है! ऐसे माहौल में भी शशि पालीवाल जी बिला नागा तय समय पर स्कूल पहुंचते हैं। चार अन्य शिक्षक भी जयपुर से तशरीफ लाते हैं, लेकिन उनके लिए सर्दी, गर्मी, वर्षा का होना लेट हो जाने का एक खूबसूरत बहाना भर है, जबकि पालीवाल जी के लिए एक चुनौती और इसमें हर दिन कामयाब होते हैं वे। लेटलतीफों के बहाने भी ऐसे कि रोज सुनने वाला शर्म से डूब जाए, जैसे, बस निकल गई, रद्द हो गई, फाटक बंद था, टायर पंक्चर हो गया, आज तो बाल-बाल बचे, बच्चा बीमार हो गया, ऐनवक्त मेहमान आ गए, बिल्ली रास्ता काट गई, आज तीए की बैठक में जाना है, रजिस्ट्री करवानी है, आज पूजा रखी है, गरुड़ पुराण का पाठ है, कन्याओं को जिमाना है, दान-पुण्य करने जाना है, सास को मंदिर लेकर जाना है, बच्चे का बर्थ डे है, मैरिज एनिवर्सरी है, वगैरह-वगैरह!
इनके बहाने सुनता हूं, तो शशि पालीवाल जी पर मुझे कभी-कभी शक होने लगता है कि इन्हें इंसान क्यों माना जाए? इंसानों के पास तो बहाने होते हैं, झूठ के पुलिंदे होते हैं, संवेदनहीनता होती हैं, अव्वल दर्जे की काहिली होती है, बच्चों का भविष्य बर्बाद करने की जिद होती है, शिक्षा का बेड़ा गर्क करने की नीयत होती है, जबकि पालीवाल जी किसी दूसरे ग्रह के एलियन्स की तरह अपनी धुन में समय पर पहुंचते हैं, जिनके न परिवार, न बच्चे, न कोई काम, बस मस्ती में झूमते हुए, शान से गर्दन उठाए आते दिखते हैं। यही नहीं, दिन भर स्कूल में प्रत्येक कार्य पूरी तन्मयता से निपटाते हैं। प्रार्थना से लेकर अध्यापन, डाक या इतर कार्य, पूरे समय वे तल्लीनता से लगे रहते हैं! क्लास खाली दिखी नहीं कि दन से पहुंच जाते हैं। शिक्षक कम हों, तो दो-तीन कक्षाओं को एक साथ बिठा व्यवस्था बना लेते हैं। दूसरों के दायित्वों को भी खुशी से अपने सिर ओढ़ लेने का दूसरा नाम है शशि पालीवाल जी। तिस पर न कोई खीज, न झुंझलाहट, न थकान, न किसी से शिकायत। शाम को भी वे मुझे उसी चमक और ऊर्जा के साथ मिलते हैं। मेरी यह जानने में रुचि रहती है कि उनकी इस सक्रियता और कार्यकुशलता का बाकी स्टाफ पर क्या असर पड़ता है। यह जानकर ताज्जुब होता है कि लोग उनसे प्रेरित होने की बजाय उलटा उनका मजाक बनाने में ज्यादा एनर्जी लगाते हैं। वे इससे भी विचलित नहीं होते। हैरत नहीं, आज ईमानदार, कर्मठ, कार्य कुशल लोग मजाक के पात्र ही समझे जाते हैं। जाहिल और भ्रष्टों के दौर में और क्या उम्मीद करें?
मैं उनसे अक्सर पूछता हूं, आप यह सब कैसे कर लेते हैं, तो प्रत्युत्तर में उनका जवाब कम, मुस्कान ज्यादा होती है। मैं समझ जाता हूं, जिनके पास बांटने को मुस्कान हो, उनके काम बोलेंगे और जिनके काम बोलते हैं उनके पास क्यों नहीं मुस्कानों का जखीरा होगा?
ऐसे माहौल में जब शिक्षक कौम (बड़ी संख्या) बच्चों के भविष्य के साथ रोज बलात्कार करती है, पालीवाल जी जैसे शिक्षक प्रशंसित, पुरस्कृत और अभिनंदित किए जाने चाहिए। सरकारों पर यकीन नहीं, क्योंकि वहां के प्रतिमान भी उनके ढर्रे जैसे हैं, लेकिन मैं उनका तहेदिल से शक्रिया अदा करना चाहता हूं।
सलाम पालीवाल सर!

December 06, 2014

श्रद्धा सुमन कुबूल करना, मित्र!

प्रधानमंत्री मुग्ध हो सकते  हैं कि उन्होंने ओबामा को गणतंत्र दिवस पर आमंत्रित कर विरोधियों को एक ही झटके में निपटा दिया है। उनका आत्मविश्वास कहता है कि वे घाटी में 'कमल' खिलाकर विरोधियों को दूसरी बार फिर पीटेंगे। तो दूसरी ओर सरकार के मंत्री 'रामजादों' की परिभाषा तय करने में लगे हैं। कुछ को मरोड़ यह उठ रही है कि मोदी नाम के बढ़ते 'हुदहुद' को कैसे रोका जाए और भानुमति का कुनबा जोडऩे के लिए कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा एकत्र करने में लगे हैं। कुछ ऐसे भी हैं, जो प्रधानमंत्री के विदेश दौरे की प्रतीक्षा में अपने शब्दकोश में आलोचनाओं के नए मुहावरे गढ़ रहे हैं, तो उनकी चिंता यह है भी कि पूर्णकालिक विदेश मंत्री होते हुए भी पीएम खुद ही विदेश मंत्री के अवतार में क्यों नजर आते हैं। सबके अपने-अपने मुहावरे, एजेंडे और सीनाजोरी है। इससे किसी को क्या कि संसद ठप है, बहिष्कार है, काली पट्टियां, काली शॉल और बिना बारिश की आशंका के काले छाते तने हुए हैं। किसी की मराठी मानुष की अस्मिता 'कुर्सियों' की बलिवेदी पर ढेर हो रही है! कुल मिलाकरर सबकी अपने अस्तित्व की छद्म लड़ाइयां हैं, शह-मात के प्रपंच हैं। अपने-अपने आलाप की मुद्रा में लीन इन सबको क्योंकर खबर होगी कि मेरा एक मित्र शहीद हो गया है। सुदूर छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के घात लगाकर किए गए हमले में दर्जन से अधिक जवान गोलियों के शिकार हो गए, जो तकनीकी रूप से 'शहीद' कहलाते हैं।
उस सूची में एक नाम राजेश कपूरिया भी था। कल रात को यह खबर फेसबुक पर पढ़ी, तो सन्न रह गया। नाम सुनकर झटका सा लगा-राजेश कपूरिया! मैं उस राजेश को जानता हूं, जिससे एमए की पढ़ाई के लिए जयपुर पदार्पण पर प्रथम बार मिला था।
दिमाग में 16 साल पहले का वह दृश्य कौंध गया, जब मैं एक बैग और बिस्तर लेकर जयपुर-लुहारू पैसेंजर ट्रेन से उतरकर किसी का इंतजार कर रहा था। वहां पहले से ही जयपुर आकर अध्ययन कर रहा एक मित्र मुझे लेने आने वाला था। वादे के मुताबिक वह तय समय पर जंक्शन पर नहीं मिला, तो मेरी जान सूख रही थी। किससे पूछूं, किधर जाऊं? बार-बार जेब में पड़े मुड़े-तुड़े एड्रेस को पढक़र किसी से पता पूछने की कोशिश कर रहा था कि तभी किसी ने पीछे से धौल जमाई। मैंने हड़बड़ाकर पीछे देखा, तो मित्र को देख तसल्ली हुई। उसने साथ आए नौजवान से परिचय कराया- यह है राजेश कपूरिया! हम अस्थाई तौर पर दसेक दिन राजेश के आवास पर रुके, जो सम्भवत: उसके कश्मीर में तैनात फौजी पिता के नाम से अलॉट था। इस दौरान इतना जान पाया कि वह भी झुझुनूं के किसी गांव का रहने वाला है, कॉमर्स कॉलेज में पढ़ता है और मिलिट्री ज्वॉइन करने की ख्वाहिश रखता है, इसके लिए वह फिजिकल एक्सरसाइज से ज्यादा इंग्लिश से जूझ रहा है। दो बार सीएसडी की एग्जाम क्लियर कर इंटरव्यू दे चुका है और तीसरी बार भी आश्वस्त था। मैं अपने संकोची स्वभाव से बाहर निकल उससे याराना कायम करता, उससे पहले ही हमने अलग कमरा किराए पर ले लिया। उसके बाद यदा-कदा राजस्थान विश्वविद्यालय में वह नजर आया। खासतौर पर लाइब्रेरी में। जब भी बात हुई, इंग्लिश से शुरू होकर इंग्लिश पर ही खत्म हुई। वह तो इस निष्कर्ष पर भी पहुंच चुका था कि शेखावाटी के आदमी को बाहर निकलने पर दो चीजें सबसे ज्यादा परेशान करती हैं, एक तो लहजा, दुसरी इंग्लिश!
रात के 12 बज रहे थे और मेरे जहन में एक ही नाम तैर रहा था-राजेश कपूरिया! छोड़ो यार, नाम तो कितनों के ही एक जैसे हो सकते हैं-मन ने समझाया! लेकिन झुझुनूं दिल धडक़ा रहा था। उसकी तिरंगे में लिपटी तस्वीर को लैपटॉप में डाउनलोड कर कई एंगल से देखा, लेकिन उलझन बरकरार थी। फिर वह तो शांत लेटा था, दीन-दुनिया से बेखबर, जैसे बरसों बाद ढंग की नींद आई हो, न क्लांत, न श्रांत! मन ने किया, इसे ही जगाकर पूछ लूं कि क्या तुम वही राजेश हो, इतने दिन कहां गायब थे दोस्त? क्या इसलिए कि एक दिन अचानक आधी को इस रूप में सामने आकर उलझन में डाल दोगे? गूगल पर सर्च किया, तो भी कोई अन्य तस्वीर नहीं मिली। (जरूरी तो नहीं, गूगल हमारी हर शंका का समाधान करे ही।)
मन में तरह-तरह के खयाल उभर रहे थे। न्यूज में फौजी पिता का उल्लेख भी था। दिमाग ऐसी कई साम्यताओं के आधार पर नतीजे पर पहुंच रहा था कि यह वही राजेश है। लेकिन मन प्रतिकार कर रहा था, तेल रीते दीए की आखिरी लौ की तरह। बेचैनी का आलम यह था कि न आंखों में नींद थी, न तसल्ली! उद्विग्नता इतनी कि बस, बिना जाने यह रात न बीतेगी, न सुबह होगी! लेकिन आधी रात को किसे जगाकर पूछूं? तब के कोई दोस्त भी तो सम्पर्क में नहीं। रात इस उधेड़बुन में बीत गई। रातें बीत जाती हैं, वे सिर्फ आपके हिस्से की कहानी छोड़ जाती हैं। सुबह उठते ही झुझुनूं में दर्जनों परिचितों को फोन करने के पश्चात एक ऐसे मित्र के नम्बर मिले, जो विश्वविद्यालय में एकाधिक बार राजेश के साथ नजर आया था। फोन मिलते ही 'कुण-शुण' के बाद जब मैंने अपना परिचय देते हुए धडक़ते दिल से कहा कि मैंने कल कोई बुरी खबर पढ़ी है, तो उसके जवाब ने मुझे बिना पैराशूट ही आकाश से धक्का दे दिया- वो ई है सागी ही...राजेश शहीद हो गया!
मेरे पास तुम्हारी ज्यादा स्मृतियां नहीं हैं राजेश; एक बार छूटे, तो फिर कभी मिले भी नहीं। जिंदगी की जद्दोजहद में इतने आगे निकल आए कि कभी पीछे मुडक़र हमने 'छूटे' को टटोलने की कोशिश भी नहीं की। आज जब तुम्हारी खबर भी आई, तो इस रूप में! अब भी विश्वास नहीं हो रहा। कोई खबर को झुठला दे। मिलिट्री ज्वॉइन करने का जुनून, इंग्लिश में बेहद कमजोर होने के बावजूद उस पर फतह और सीआरपीएफ में असिस्टेंट कमांडेंट के रूप में सेवाएं देते हुए शहादत को प्राप्त हो जाना! कुल इतनी सी कहानी लगती है, लेकिन तुम बहुत कुछ कर गए हो। तुम मर कर भी 'जी' गए हो! मरे हुए तो वे हैं, जिनके पास इन अंतहीन लड़ाइयों के हल नहीं, करुण गाथाओं के उपसंहार नहीं।
सरकारों के पास पैकेज हैं, मेरे पास श्रद्धा के दो फूल हैं। मित्र, इन्हें स्वीकार करना!
तुम्हारे हिस्से का तुम कर चुके, हमारे हिस्से यही है!
पुनश्च: शेखावाटी में परिवारों में पीढ़ी दर पीढ़ी सैनिक होने की गौरवशाली परम्परा है। संयोग से पिता बच गए थे, दुर्भाग्य से बेटे नहीं बच सके या पौते!
(तस्वीर साभार- PilaniNews Pilani)

December 02, 2014

सिकुड़ती जमीन
- सुरजीत सिंह
वह पहले खेत हुआ करता था। देहयष्टि से भी और अपने गर्भ में उगाने वाली फसलों के लिहाज से भी। महज पांच-दस साल का संक्षिप्त सा समय गुजरा है और अब वह सिकुडक़र प्लॉट का एक टुकड़ा भर रह गया है। चारों ओर ऊंचे, कई मंजिला फ्लैट, मकान, बिल्डिंग बन गए। फॉर्म हाउस अस्तित्व में आ गए। आजकल शहरों के आस-पास फॉर्म हाउस क्रांति में तेजी हैं, यह पैसे वालों की मानसिक अय्याशियों का नतीजा हैं, जिनमें फसलें नहीं उगतीं, रिटर्न के लालच में निवेश के मनी प्लांट उगाए जाते हैं।
खेत के दूसरी तरफ कोने में किसी दिमाग की फूली हुई नसों के जैसा दुकानों का गुच्छा सा उभर आया है। पास में पानी की विशाल टंकी, बगल में फास्टफूड की दुकानें, डिपार्टमेंटल स्टोर, तीन तरफ फ्लैट और बिल्डिंगें! बीच में यह सिकुड़ा हुआ खेत! ताज्जुब है इसका बचे रहना और इससे बड़ा ताज्जुब है कि इसमें किसान ने अब भी थोड़े से टमाटर, मिर्च, बैंगन लगाने की जिद पाल रखी है। गोया खेत की आत्मा को जीवित रखने के प्रयास जारी हैं। अपने फ्लैट की खिडक़ी से देखता हूं, तो मुझे यह खेत षड्यंत्र का शिकार प्रतीत होता है। कभी दूर तक खेत ही खेत, फिर शनै:शनै: कटता गया, टुकड़ों में। यह सोचकर कांप जाता हूं कि बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाएगी? चारों ओर घातक नजरें लगी हुई हैं। कभी-कभी यह खेत ड्रेगन चीन की चालों में फंसा तिब्बत, वियतनाम, हॉन्गकॉन्ग सरीखा लगता है। कभी शेरों के झुण्ड से घिरा कोई मासूम मेमना सा।
गौर से देखा तो एकाएक लगा जैसे दिल्ली के चिडिय़ाघर में बाघ 'विजय' के खूंखार पंजों में फंसा मकसूद है, बचाने की मर्मान्तक गुहार लगा रहा है! खेत को देखते-देखते मेरी नजरें सिकुडक़र अपने फ्लैट के इर्द-गिर्द गई। जायजा लिया, तो सैटबैक नदारद पाया। बगल में खाली प्लॉट पर जिस दिन फ्लैट बनेगा, हम खिड़कियों से एक-दूसरे के यहां जाने लगेंगे। दरवाजों की उपयोगिता खत्म हो जाएगी। लेकिन अहम सवाल यह कि हम क्यों जाएंगे भला? हम फ्लैटधारी भी आपस में कितने सिकुड़े हुए हैं। बरसों अगल-बगल, ऊपर-नीचे रहते-रहते एक दूजे को शक्ल से जानने के सिवाय और क्या जानते हैं?
बाहर निकलता हूं, दुनिया सिकुडऩे लगती है। रोड भी पहले जैसी खुली, हवादार नहीं है। अतिक्रमण ने सडक़ की अस्मिता छीन ली है। फुटपाथ पहले सिकुड़ते हैं, फिर कहानी के पात्र की तरह हो जाते हैं- यहां कभी फुटपाथ थे! एक शहर में पार्किंग स्थल ढूंढना तो मंगल पर पानी खोजने की तरह है।
महंगाई ने समोसा, कचौरी की साइज को भी बहुत सिकोड़ा है। रेट अलबत्ता न बढ़ी हो या कम बढ़ी हो, लेकिन भरपाई साइज घटाकर कर ली गई। बिस्किट, चिप्स, नमकीन, दाल सहित अन्य खाद्य सामग्रियों के पैकेट्स पर दृष्टिपात किया, तो पाया रेट यथावत, मगर वजन हल्का हो गया है। अब मुझे हर चीज सिकुड़ी हुई नजर आने लगी।
फिर एकाएक ध्यान आया, पिछले हफ्ते मैंने अंडरवीयर और बनियान खरीदी थी। नम्बर वही अपना 85 था। जब से ये चीजें खुद खरीदने लगा हूं, तब से गरीबों की गरीबी और अपना '85' नम्बर चिरस्थाई है। लेकिन एक हफ्ते में टांके उधडऩे लगे तो आश्चर्य हुआ। पहनने में भी काफी तंग लगीं। शायद नम्बर छोटा आ गया हो। बार-बार देखा, नम्बर दुरुस्त था। फिर ब्रेकिंग न्यूज यह निकली कि शायद अंडरवीयर, बनियान भी सिकुडऩ के शिकार हो गए हैं। जल्द हम भी सिकुडक़र इनके नाप में आने लगेंगे।
इसी बीच एक अनोखी घटना घटित हुई है। लोगों को यह जानकर कौतूहल हुआ कि जयपुर में दिसम्बर के प्रारम्भ में पंखे चलते पाए गए। स्वेटरें, शॉल, कम्बल, मफलर, गर्म टोपियां व्यस्तता के दिनों में बेरोजगार बैठी हैं। कहीं सर्दियां भी न सिकुड़ रही हों? बिलकुल! मौसम विशेषज्ञ कह रहे हैं कि अचानक जयपुर से दिशाएं भटक गई हैं। सो, गर्मी दिसम्बर में भी बनी हुई है। मतलब साफ है, सर्दियों का मौसम भी सिकुड़ रहा है। हवाएं भी सिकुड़ रही हैं। कहीं कुछ सिकुड़ता है, तो कहीं ओर कुछ विस्तार पाता है। अनावश्यक तापमान बढ़ रहा है। ब्लैक होल बढ़ रहा है। ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा बढ़ रही हैं। ओजोन में छेद बड़ा हो रहा है। इसलिए सर्दियों का दौर लघु होना असामान्य घटना नहीं है।
यदि आज हमारे दिमागों को स्कैन किया जाए, तो उनकी सिकुडऩ किस कदर निकलेगी अंदाजा नहीं है। अनुमान से ज्यादा ही संकुचित पाए जाएंगे। दिलों में भी पहले से ज्यादा तंगदिली है। बड़े दिल और खुले दिमाग किसी प्रयोगशाला में तो नहीं बनाए जा सकते हैं न?

November 13, 2014

कांस्टेबल भी संवेदनशील होता है!

एक ही मकान में मेरे पड़ोस में रहने वाला कांस्टेबल दो दिन से अन्यमनस्क है, चुप सा है, अजीब सी खामोशी में लिप्त है, अनिद्रा का शिकार है। मुझे यह देखकर ताज्जुब हो रहा है कि उसे दो दिन की छुट्टी कैसे मिल गई, जबकि बाह्य तौर पर या कहें लाक्षणिक रूप से वह बीमार भी दिखाई नहीं दे रहा। वरना उसे एक-एक दिन की छुट्टी के लिए जयपुर मुख्यालय तक गुहार लगाते मैंने देखा है।
फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि नित्यप्रति सुबह पांच बजे उठकर दौड़ के लिए निकल जाने वाला, छह बजे अपने दोनों बच्चों को उठाकर दैनिक कार्यों से निवृत्त करा, छत पर उन्हें थोड़ी वर्जिश करा, फिर नहा-धुलाकर आठ बजे उनकी स्कूल वैन आने से पहले एक घंटे पढ़ाई भी करवा लेता। दोपहर को भागते-दौड़ते खाना खाने आता, तब भी जाते-जाते बच्चों को कुछ सबक याद करवा जाता। शाम को आता, तब भी मैं उसे बच्चों के साथ पढ़ाई में ही मशगूल देखता। मुझ जैसा घोर आलसी रोज यह देखकर हैरान रह जाता है कि नौ बजते-बजते उधर के पॉर्शन में बत्तियां गुल हो जाती हैं और एक सन्नाटा पसर जाता है। उसे तोड़ते खर्राटे ही सुनाई देते हैं, बस! यह दैनिक क्रिया पिछले चार माह से मैं अनवरत देख रहा हूं। यही वजह है कि सुबह वह परिवार इतना जल्दी उठ पाता है और हम साढ़े सात बजे उठकर थोड़ी शर्मिन्दगी, थोड़ी झेंप के साथ रोज शपथ ग्रहण करते हैं कि कल से हम भी कोशिश करेंगे, लेकिन जल्दी उठेंगे तो तब ना, जब रात 12 बजे सोने की आदत को बदलकर दस बजे बिस्तर पर आने का अभ्यास करेंगे।
खैर, उसकी खामोशी मुझे दो दिन से अखर रही थी। बच्चों से उसे बतियाते भी नहीं सुना। आज सुबह सच भी सामने आ गया। तीन रोज पहले आधी रात को बाइक सवार एक युवक का एक्सीडेंट हुआ। एक्सीडेंट भी ऐसा दर्दनाक कि एक युवा शरीर सडक़ से इस कदर चिपक गया कि घंटों की मशक्कत के बाद खुरचकर ही बोरी में भरा जा सका। उसे खुरचने वाला कोई और नहीं, मेरा पड़ोसी कांस्टेबल ही था। तब से वह सदमे में है। उसकी खोई-खोई सी आंखों में उस मंजर की भयावहता लहरा रही है! जब से यह जाना है, बड़ी बेचैनी है। एक मलाल भी है कि गाहे-बगाहे, हर कहीं वर्दी वाले को देखते ही ठुल्ला, बेईमान, संवेदनहीन, चोर जैसे मुफ्त के तमगे देने की जल्दी में रहने वाले हम लोग कभी सोचते हैं कि एक कांस्टेबल भी संवेदनशील हो सकता है और वह किन परिस्थितियों में काम करता है, छुट्टी शब्द जिसकी नौकरी में नहीं है, सारे पारिवारिक दायित्वों में लगभग उसकी अनुपस्थिति तय रहती है या भागमभाग में निपटाता है। ऊपर से विभाग से लेकर आम जन की गालियों की बारिश अलग! जो लोग, एक घायल को तत्काल अस्पताल पहुंचाने जितनी संवेदना भी नहीं दिखाते, उसके दस मिनट लेट आने को आराम से गरिया सकते हैं, कोस सकते हैं, भीड़ का हिस्सा बनकर पत्थरबाजी, गालीबाजी, ट्रेफिक जाम, नारेबाजी कुछ भी करने के लिए जैसे अधिकृत हैं। हर नौकरी में लेटलतीफी, बंक मारना, ऑफिस से नदारद रहना, मौजूद रहकर भी काम नहीं करना, छुट्टी मारकर साइन करना (आज तू, कल मैं की तर्ज पर) आराम से चलता है, लेकिन पुलिस में ऐसा मुमकिन नहीं, हर्गिज नहीं!
राजस्थान पत्रिका (जयपुर मुख्यालय) में 12 साल पुलिस बीट में काम कर चुका मेरा मित्र ओमप्रकाश शर्मा बार-बार यही कहता है कि 'अगर सिस्टम कहीं बचा हुआ है, तो सिर्फ पुलिस के कारण। बाकी सारे विभाग फेल हो चुके हैं। मैंने सारे विभागों की कार्यप्रणाली नजदीक से देखी है, लेकिन पुलिस की हर आवश्यक जगह मौजूदगी अनिवार्य है और वह वहां होती है। कहीं सडक़ टूटने, बिजली वालों, टेलीफोन वालों की मेहरबानी से सडक़ खुदने, फिर भरने के लिए पलटकर नहीं आने या रोड पर एक पशु के मारे जाने से जाम लग जाए, तो उसे खुलवाने, पशु उठवाने, गड्ढ़े भरवाने के लिए भी एक आम दिमाग में कोसने के लिए पहली छवि जो उभरती है, वह पुलिस की ही होती है। नगर निगम या सडक़ वाले महकमे के लोगों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती।'
ओमप्रकाश के पास गिनाने के लिए एक लंबी फेहरिस्त है, उसे आप चाहकर भी नकार नहीं सकते।
मेरे उससे सहमत होने के पर्याप्त कारण हैं!

August 26, 2014

आमिर का 'ट्रांजिस्टर '

- सुरजीत सिंह
सर्पाकार सी लेटी हुई रेल पटरी है। नॉस्टेल्जिया सा ट्रांजिस्टर है। थोड़े पुराने, ज्यादा नए आमिर हैं। सद्यजात खान है। आधुनिक संस्कार सी देह है। कुल लब्बोलुआब यह कि पटरियों के बीचोंबीच आमिर खान नग्न खड़े हैं, सपाट, भाव शून्य, वस्त्रहीन! हाय! सारी शर्म-हया छोड़...तौबा, तौबा!! वे इंडिया की नजर में न्यूड हैं और भारत की दृष्टि में नंग-धड़ंग। वर्तमान के मुहाने पर खड़े बेशर्म भविष्य की तरह। बदन पर लज्जा वसन नहीं है। सो, लाज किसी तरह ट्रांजिस्टर से ढांपे हैं। कसी हुई नग्न देह बाजार की प्रत्यंचा पर चढ़ी हुई है और ट्रांजिस्टर जैसे लगभग शेष रह गए सांस्कृतिक अवशेष की तरह है, जो आधुनिकता की आंधी से अंतिम मुकाबला लड़ रहा है।
यह वह आत्मलीन दौर है, जिसमें अनावृत्ति, निवृत्ति, मुक्ति ही परफेक्शन की निशानी है। जिसको बाजार की सुनामी ने उघाड़ दिया, उसे दुनिया भर के मॉडर्न और अपार रेंज वाले वस्त्र भी क्या ढांपने की कूव्वत रखते होंगे? उलटबांसियों के इस युग में जो सघोष जितना वस्त्राच्छादित, उतना ही अनावृत्त! जी हां, यहां माल बिकता है! आमिर भी कुछ बेचने निकले हैं। वे स्वयं माल की तरह प्रस्तुत हैं। तसल्लीबख्श यह है कि आमिर के हाथ में ट्रांजिस्टर है। अगर हाथ में लोटा होता, तो वे सब पटरी वाले हाहाकारी चिंता में पड़े होते, जिनका सुबह-सुबह रेल की पटरियों पर लोटा चिंतन का जन्मसिद्ध अधिकार है। आमिर के ट्रांजिस्टर ने उन्हें दुविधा मुक्त कर दिया है। लेकिन आमिर की तरह ही अनुत्तरित सवाल यह खड़ा है कि आमिर यूं क्यूं खड़े हैं? उनकी दशा, दिशा क्या है? कहा जा रहा है आमिर 'पीके '  नग्न खड़े हैं। पिया हुआ बहकने को थोड़ा स्वतंत्र होता है। जबकि यहां तो अनपिये लोग, पूरे होशोहवाश वाले 'बहके ' हुए हैं, फु ल नंगई मचाने पर तुले हैं।
भरे बाजार नीलामी हेतु प्रस्तुत हैं:- कोई उनके सारे वस्त्र ले जाए। सारी लाज ले जाए। बचा-खुचा चरित्र ले जाए। ईमान ले जाए। संस्कार ले जाए। नैतिकता ले जाए। कायदों से शर्म-लिहाज ले जाए। पहचान ले जाए। पुरखों की कमाई इज्जत-आबरू ले जाए। बदले में ढेर सारी बदनामी दे जाए। बेईमानी दे जाए। अहा, वह ऊंचाइयां दे जाए, जो रातों-रात चमकता कंदील बना दे, कंगूरा बना दे, सेलिब्रिटी स्टेटस दे दें।
उचककर गौर से देखें तो आमिर के पीछे विराट भारत खड़ा है। नंग धड़ंग। पूर्णत: अनावृत्त। स्वत्व से निवृत्त। मूल से रहित। लालच की पटरी पर सवार। नेता चरित्र से। नई पीढ़ी संस्कारों से। परिवार परम्परा से। समाज मूल्यों से। राष्ट्र जड़ों से। राज नीति से। अफसर ईमान से। बाबू काम से। बाबा संतई से। हीरोइन वस्त्रों से। एक्टर एक्टिंग से। फिल्में कहानी से। साहित्य उद्देश्य से। कार्य कारण से। नदियां किनारों से। सागर तट से। मौसम मियाद से। हवाएं दिशा से। माटी महक से। एनआरआई वतन से। पुरुष पौरुष से। औरत हया से। युवा युवकोचित कर्म से। पढ़ाई सिद्धांत से। गुरु पढ़ाई से। शिक्षण गांभीर्य से। विश्वविद्यालय शोध से। प्रोफेसर अध्यापन से। खिलाड़ी खेल भावना से। सरकार दायित्वों से। संसद मर्यादा से। पुलिस संवेदना से। कानून पालना से। आंखें पानी से। शरीर आत्मा से। अंतस जमीर से। इच्छाएं संयम से। आदतें व्यवहार से। भाव पहुंच से। वस्तुएं क्रय शक्ति से। गरीब जिंदगी से। परवरिश पोषण से। उफ्, बड़ी लंबी फेहरिस्त है।

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- सुरजीत सिंह,
36, रूप नगर प्रथम, हरियाणा मैरिज लॉन के पीछे,
महेश नगर, जयपुर -302015
(मो. 09001099246)

July 24, 2008

विश्वास के हिमालय से सारी बर्फ पिघल चुकी

संसद में दो दिनी अप्रिय शोरगुल के बाद देश में हृदयभेदी सन्नाटा है। सब कुछ एकदम से खामोश है- सिवाय कुछ दलों में जयचंद चिन्हित और घोषित कर उन्हें पार्टी बदर करने के, कोई बड़ी उल्लेखनीय हरकतें नहीं हो रहीं। हो भी जाएं, तो इसे महज खिसियानी बिल्ली के खम्भा नोचने से अधिक का दर्जा नहीं दिया जाएगा। सारी कुल्लेखनीय हरकतें उन दो दिनों में और उससे पहले हो चुकी हैं। अब और गुंजाइश नहीं।
सत्ता प्रतिष्ठानों के पिछवाड़े अर्थात दस जनपथ में जीत के जश्न की रस्म जरूर है, लेकिन आशंका वहां भी बरकरार है। इसमें जीत जैसा कुछ नजर नहीं आता। जीतकर भी करारी हार सा बोध हर कोई कर सकता है। मुहावरे में कहें तो दस माह की मेहमान सरकार पर अपेक्षाओं का पहाड़ टूट पड़ा है। जो चार साल में एक अपेक्षा पूरी न कर पाई हो, वह दल माह में क्या कर लेगी। इस ताजा हरकत से नेताओं का सरेआम राजफाश जरूर हो गया। राजनीति में सारे ईमान, नैतिकता, आचरण, शुचिता इत्यादि को लेकर अब तक जो भ्रमजाल का तंबू तना हुआ था, वह एक झटके में खुल गया। बेईमानी और भ्रष्टाचार की ऐसी आंधी आई कि संसदीय मर्यादा को यूं हल्के में उड़ा ले गई। एक औसत भारतीय मन अपने इर्द-गिर्द सशंकित सा नंगई महसूस कर रहा है। अफसोस की बात है कि यह नंगई उन बेशर्म मनों द्वारा नहीं महसूसी जा रही, जहां से इसकी अपेक्षा की जाती है।
दो दिन तक टीवी पर आंखें गड़ाए रहे चेहरे मुर्दनी बयां कर रहे है। वहां जो सेंसेक्स से उतार-चढ़ाव नोटिस किए जा रहे थे, वे अब गहरी खामोशी और अफसोस से पुते हैं, भीतर खतरनाक कोलाहल उबल रहा है। उस आंच से व्यथित मन पक रहा है। विश्वास की बर्फ पिघल रही है। आंखें मलने की विवशता इसलिए है कि क्या यह ड्रामा वास्तविक था या कोई बड़ी दुर्घटना? जिसके घटित हो जाने के बाद मन इतना खिन्न कि अब वह कोई और कल्पनामयी आकांक्षा पाल सकेगा या नहीं? कमजोर हिन्दुस्तानी मनों पर टनों अवसाद लद गए हैं।
अब यह मानना ही पड़ेगा कि संसदीय मर्यादा का हिमालयी शिखर झुक गया है। भरोसे की बची-खुची बर्फ को पिघलने में दो दिन भी नहीं लगे। जिस भरोसे को नेहरू, शास्त्री, पटेल जैसे नेताओं ने कायम किया था। अब वहां नंगई है सिर्फ नंगई। लाज का वस्त्र उघड़ चुका। भरोसे का नाड़ा खुल गया। ढांपने की फिक्र भी नहीं है किसी को। वह इसीलिए नहीं है कि अब आचरण में शुचिता कोई मसला नहीं रह गया है। छोड़ आए उन गलियों को वाला मामला हो गया है, जहां शुचिता के झंडे गड़े रहते थे। एक सूत्री मसला सिर्फ सत्ता है और उसे किसी भी सूरत में पा लेना ही परम लक्ष्य की प्राप्ति है। यही किया सबने मिलकर। गिरावट का आलम इस कदर हुआ है कि इस हादसे के बाद अब कोई साधारण व्यक्ति सत्ता की गलियों में कदम रखने की नहीं सोच सकता। दहलीज पर प्रथम कदम ही उसकी आत्मा को झिंझोड़ देगा।
विश्वास मत के नाम पर अविश्वास जीत लिया गया। बहुत बुरी खबर है। अब आगे के रास्ते किस अंजाम की तरफ ले जाने वाले हैं, आप-हम सोचकर सिहर सकते हैं।

July 22, 2008

मंगल का हो गया मुंह काला

मंगल का मुंह काला आखिर कर ही डाला। यही तो मैंने चार दिन पहले लिखा था। आपने भी लिखा था। सबने यही लिखा था। सबको अंदेशा था। होता क्यों नहीं? जो हो रहा था, उसे तो होकर रहना ही था। अब आप क्या करेंगे? दो दिन से टीवी से चिपके हैं, आप, हम, समूचा देश। झुकी हुई गर्दनें, विस्फारित सी आंखें, शर्मिन्दगी से भरा हुआ माहौल। थूक देने को जी चाहता है इन मनहूस चेहरों पर। जिन्हें आप और हमने ही मालाएं पहनाईं थी। कितनी मक्कारी बयां हो रही है इन चेहरों पर। जुबां पर जो है, वह आंखों में नहीं। आंखों में जो है, वह चेहरों पर नहीं। जो होना चाहिए, वह कहीं नहीं। जो नहीं होना चाहिए, वह हर तरफ है। कोई अछूता नहीं। दूध से नहाया हुआ हर शख्स कलुषित है भीतर गहरे तक। खामोश है पूरा देश।
बस, संसद में शोरगुल है।
धिक्कार। मगर किसे? खुद को ही.......................।

July 12, 2008

बारिश की एक बूंद और हजार अर्थ

भारत जैसे कृषि प्रधान देश में मानसून मेहमान की तरह है। एक ऐसा मेहमान जिसके आगमन का सभी को बेसब्र इन्तजार रहता है। अक्सर इसकी देरी जनमानस को बेचैन कर देती है। इसको लेकर उनकी अत्कंठा छुपाए नहीं छुपती। और जब यह आता है, तो इसकी फुहारें प्राणी वृन्द को हुलसित-हर्षित कर देती है। आज रात से ही बारिश हो रही थी। सुबह घूमने के इरादे से उठा भी तो बारिश की टपाटप सुन वापस दुबकने का बहाना मिल गया। बूंदों की लोरी ने चैन की नींद सुला दिया। आंख खुली तो घड़ी की सुई नौ पर थी। गीले अखबार में कोई अपील नहीं थी कि उसे पढ़ा जाए। बस, पढ़ने की विवशता के चलते सरसरी दृष्टि डाल बरामदे में बैठ गया। बूंदो को निहारना काफी सुकून भरा लगा। आज ऑफिस भी भीगते हुए ही जाने का मन हुआ। मोटरसाइकिल धीरे-धीरे चलाते हुए, बारिश के खयालों में खोया ऑफिस पहुंचा।
कम, तेज होती बारिश की तरह ही मन में खयाल आ-जा रहे थे। आखिर बारिश में ऐसा क्या जादू है? बूंदों में जाने कैसी चुम्बकीय शक्ति है कि हर कोई अन्तर्मन से बंध जाता है। लेकिन सबके लिए बारिश के अपने-अपने मायने हैं, अपने-अपने अर्थ हैं। किसान जहां आसमान में आए श्वेत-श्याम बादलों का मैसेज पढ़कर खाद-बीज के इन्तजाम में जुटता है और खुशी पालता है कि चलो, इस बार तो सूखे से मुक्ति मिलेगी। आगे क्रमवार बारिश के साथ उसके खेत भी हरियाली के जरिए अपनी खुशी जाहिर करते हैं।
सरकारों के लिए किसान की इस खुशी का कोई खास अर्थ नहीं। सरकार और बादलों का संयोग यह है कि अच्छी बारिश उसके लिए किसान के प्रति दायित्वों से मुक्ति का पर्व है। समय पर खाद-बीज का उपलब्ध नहीं होना सरकारों की बेरुखी का ऐतिहासिक दस्तावेज है।
सरकारी दफ्तरों के लिए भी बारिश के अपने-अपने मजे हैं। वे इसका अपने हिसाब से मैसेज पढ़ते हैं और बूंदो को अर्थ देते हैं। अफसर और किसान की खुशी में पाताल फर्क है। किसान की देह जहां अगले छह माह मेहनत की खुशी में गंधाती है, वहीं अफसर की देह से हर एक बूंद को कैश में बदलने को ललक फूटती है। सड़कों में हुए गहरे घाव, उसके लिए और उसके मातहत कर्मचारियों के लिए मलहम का काम करते हैं। या वे कामना करते हैं कि इस बार सड़क पानी में बह जाए। एक जोरदार बारिश हो और सड़क डामर, पत्थरों समेत पूरी तरह धुल जाए। तो उनके भी कई पाप धुल जाएं। ठेकेदार आसमान में बादल देख, नए टेण्डर की खुशी में झूमता है। उसके मन में बेशर्म इरादे उगते हैं, और सरकारी कारिन्दों के ड्राइंग रूम में ये इरादे उनकी आंखों में नए अर्थ पैदा करते हैं।
बारिश में कागजों की नाव चलती हैं। कागजों में चलती हैं। कागजों में ही इन्तजाम होते हैं। बारिश का बाढ़ की शक्ल में आया एक रैला उन कागजों की पोल खोल देता है।
इस मौसम में सरकारी दफ्तरों का हरियाली प्रेम भी प्रस्फूटित होता है। उनके लगाए पौधे भले ही न फूटें, लेकिन उनके मन में हरियाली के पूरे बाग फूट पड़ते हैं। पौधे फाइलों में आंकड़ों की शक्ल अख्तियार कर लेते हैं और बारिश के वेग के साथ शून्य आकार में बढ़ते जाते हैं। बारिश गुजरने के साथ सड़कों के किनारे वही हालात, बाग, नर्सरियों में वही वीरानी, लेकिन सरकारी कारिन्दों के महकते लॉन पड़ौसियों को भी खबर कर देते हैं।
इस प्रकार बारिश के चार माह भारतीय जीवन को नए अर्थ दे जाते हैं। पढ़ने वाले इसे बखूबी पढ़ते हैं, और नए अर्थ गढ़ने वाले भी कमतर नहीं।

July 10, 2008

दिल्ली के आसमान में ये कैसे बादलों का जमावड़ा?

देश में जितनी भी दिशाएं हैं, सभी से इस समय बादलों का रुख दिल्ली की ओर है। हर छोटा, मोटा, धूल-धूसरित, मैला, मटमैला, छोटा, बड़ा बादल कुछ सशंकित सी मुद्रा लिए राजधानी की ओर डायवर्ट है। अवसरवादिता की हवाओं ने उन्हें अपने संग लिया और उड़ चलीं दिल्ली की ओर। दिल्ली के आसमान पर ये बादल घनीभूत हो रहे हैं। ये बादल अन्ततः उम्मीद ही तोड़ेंगे। बरसने की भूलभरी अपेक्षा इनसे कदापि न की जाए। ये बरसेंगे, तो खुद के स्वार्थ के लिए। खुद के अस्तित्व के लिए। सांसदी की रक्षा के लिए। हार के डर से और जीत के गणितीय हिसाब से।

इन बादलों के गर्भ में धूर्त एजेण्डा छुपा है। बाहर से नैतिकता का रंग चढ़ा है। सिद्धान्तों के आवरण की महीन, बारीक परत है। भीतरी खोल में पोल ही पोल है। कुछ का लक्ष्य सरकार गिराना है। कुछ का बचाना है। कल तक लड़ने में कुत्ते-बिल्ली को भी मात करते रहे। आज एक-दूजे पर प्यार उंड़ेलते नहीं थकते। स्थाई दुश्मनी ने क्षणिक दोस्ती का बाना धारण कर लिया है। सरकार की रक्षा की गरज से अपने बचे-खुचे सिद्धान्तों पर घासलेट छिड़कने पर आमादा हैं। अन्तरात्मा का आह्वान भी नक्कारखाने में तूती की आवाज सा हो चुका है। ऐसा कोई सदाचार का ताबीज नहीं, जिसे कलाई पर बांध देने से इनकी भ्रष्ट आत्मा की गर्जना के सुर बदल जाएं।

कहें तो, मौजूदा राजनीतिक हालात में कई दलों की कैंचुल उतर चुकी है। तीन तलाक कह सरकार गिराने पर आमादा वाम मोर्चा को इस समय कुछ नहीं सूझ रहा। इस बेमकसद के लिए उसे उसके लिए सदा साम्प्रदायिक रही भाजपा से हाथ मिलाने से भी ऐतराज नहीं। सपा ने घोषित समाजवाद का मुल्लमा उतार फेंका है और दिखावे के देशप्रेम तले अवसर का गाढ़ा लेप पोत लिया है। भाजपा को हर हाल में चुनाव चाहिए। आखिर वे एक बेरोजगार पीएम का बोझ कब तक उठाएं? क्यों न चुनाव के बहाने इसे देश की पीठ पर लाद मुक्ति का पर्व मनाएं। हर छोटे-बड़े दलों की अपनी आशंकाएं हैं और सरकार गिराने-बचाने के अपने सुभीते हैं। सब इन्हीं से प्रेरित होने हैं। यदि परमाणु करार बेजां देशहित में है, तो भी लेफ्टियों को इससे क्या मतलब? उनका राइट तो वहीं तक है, जहां से उनका अमरीका विरोध जाहिर हो जाता है। वे इसे भी भूल के कचरापात्र में डालने की पात्रता अर्जित कर चुके हैं कि उनके सरपरस्त चीन, रूस भी इन्हीं करारों को करने को लालायित हैं या कर चुके हैं।

धोखे और दिखावे के दीपक देश की राजनीति को कब तक आलोकित करेंगे। यह गिरगिटी रंग अब बेपरदा होना ही चाहिए। और अगले चुनावों में इनका असली रंग उघाड़कर देखा जाना चाहिए। कौनसा रंग किस बेरंगेपन के बावजूद खासा चमकता है। इस त्वचा के भीतर एक और मोटी त्वचा का पहरा है।

July 08, 2008

शब्दों के हथियारों से मुंह तोड़ने की निरर्थक कवायद

हम आतंकवाद के आगे नहीं झुकेंगे। कोई ताकत हमारे मंसूबों को विफल नहीं कर सकती। कितने ही हमले हमें हमारे मिशन में नाकामयाब नहीं कर सकते। पड़ौसी देशों को मदद जारी रखेंगे। हम आतंकी घटनाओं का मुंहतोड़ जवाब देंगे। यह एक रिकोर्डेड सीडी है। पुराना कैसेट है। जो हर आतंकी घटना के बाद बजता है। यह शास्त्रीय बयान है। जो हर वारदात के बाद आता है। वही मुख। वही बातें। वही संकल्प। वही लफ्ज। पीएम, विदेशमंत्री, गृहमंत्री, रक्षामंत्री, जरूरी हुआ तो पार्टी अध्यक्ष के श्रीमुख से झरता एक-एक शब्द। चबा-चबा कर बोले गए अर्थ खोए वाक्य। जब पहली वारदात हुई, तो शर्तिया पहला बयान यही आया होगा। हू-ब-हू। बित्ते भर का फर्क नहीं। मुंह तो हम आज तक तोड़ न सके, पर बेतहाशा बयान दे-देकर खुद का मुंह जरूर तोड़ लेते हैं।

काबुल में भारतीय दूतावास पर हमले के बाद फिर शब्दों के हथियार चलाए गए। बयानबाजों के मुंह के आगे मीडिया के माइक आए। रिपोर्टरों ने जेब से कलम-डायरी निकाली और जिस जोश से सवाल दागे। सामने से उसी ठण्ड से जवाब। पीएम ने जी-८ शिखर वार्ता में जाते समय विमान से बयान दिया। प्रणव मुखर्जी ने दिल्ली से। बयान विमान से आए, भले दिल्ली से या दस जनपथ से। न भाषिक अन्तर, न वैचारिक। बयानों के केन्द्र में कोई संकल्पना नहीं। इरादों में दृढ़ता नहीं। गर्मी का नितान्त अभाव। बयान देने की विवशता न होती, तो शायद इतनी जहमत भी न उठाई जाती।

दो कामयाब अधिकारी और दो जवानों की मौत। सबसे बड़ी बात यह है कि स्वाभिमान पर आंच। और हम जिद पाले हैं पड़ौसी देश के पुनर्निर्माण में मदद का। इससे पहले भी वहां भारतीयों पर दो हमले हो चुके हैं। तब भी हमने ऐसे ही शब्दों के बाण चलाए थे। पूरी कौशलता से वाक्य विन्यास से भरा चेतावनी का मायाजाल रचा। लेकिन हुआ क्या? वही भीगा हुआ पटाखा फुस्स। बारूद की गारंटी नहीं। हम ऐसे बयानवीर हैं, जो लगातार मात के बावजूद शब्दों के खोल से बाहर निकलने को इच्छुक नहीं। क्या हम अफगानिस्तान से दो टूक बात नहीं कर सकते। हामिद करजई बड़े मेहमाननवाजी का लुत्फ उठाते हैं हमारे यहां। सिर-आंखों पर बिठाते हैं, पलकें बिछाते हैं उनके आगमन पर। लेकिन अब उनका मौन, कोई बयान न देना गहरे अर्थों को जन्म देता है।

हमारे टुकड़ों पर पलने वाला पिद्दी सा बांग्लादेश भी यदा-कदा हमें गरिया देता है। श्रीलंका का चोखटा बचाने के लिए हमने शांति सेना के जरिए कितने ही सैनिक खोए। और फिर युवा नेता भी। बावजूद इसके श्रीलंका की हमें ही चिरौरी करनी पड़ती है। नेपाल, भूटान, अफगानिस्तान कोई विशुद्ध दोस्ती के काबिल नहीं। हम गले मिलें। वे जेब में छुरा रखें। हमारे ही खिलाफ आतंकियों को प्रश्रय दें। अपनी सीमाओं से आत्मघाती जखीरा ठेलने में मदद करें। हम उनके सामने ट्रे में रखकर दूध का प्याला पेश करें। सांप और मित्र की परख हमारे बयानवीर अपनी कैंचुल से बाहर आ कब करना सीखेंगे।

July 07, 2008

हिसाब मांगती एक-एक सीढ़ी

बारी-बारी से सत्ता का मधुपान कर, पूरी तरह रस निचोड़ जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री बेमन से राजभवन की ओर जा रहे हैं। (अलबत्ता पहुंच चुके) पांव भारी हैं। जेब में इस्तीफा पड़ा है। बोझ से पग डगमगा रहे हैं। मुगालते में जीते-जीते वे आखिरी सच के द्वार पर आ पहुंचे। और उस नीम सच से सामना कर रहे हैं, जिससे कल को केन्द्र की कांग्रेस सरकार को भी करना है। और हर उस पार्टी को करना पड़ता है, जो सिद्धान्तों को कैरोसिन दिखा, इस उजाले में सत्ता की चौखट चढ़ती है। आज उसी चौखट से कांग्रेस नीचे उतर रही है। पीडीपी, जो पहले ही मधु के छाते को खाली कर चुकी थी, ने और इन्तजार करना मुनासिब नहीं समझा और समर्थन वापस ले लिया। ढाई साल इन्तजार करते-करते एक अदद बहाने का छींका उनके हिस्से टूटकर गिर ही गया। जिसके सहारे समर्थन वापस लिया जा सकता था। हालांकि सरकार को बली से बचाने के लिए मुख्यमंत्री ने अमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी जमीन वापस भी ले ली थी। लेकिन, अफसोस, सरकार को बचाया नहीं जा सका और मुख्यमंत्री को इस्तीफा लेकर राजभवन की सीढ़ियां चढ़ना पड़ा। सत्ता की सीढ़ियां झटपट चढ़ लेने की स्फूर्ति यहां गायब रही होगी। एक-एक सीढ़ी चढ़ते वे दिन याद आ रहे होंगे उन्हें।
उन्हें और भी बहुत कुछ याद आना चाहिए। पहली सीढ़ी पर पांव धरते ही याद आया होगा कि बेमेल मिश्रण का स्वाद एक दिन कितना कटु होता है। कुछ दिन तू सत्ता सुख चाट, कुछ दिन मुझे चटा, की तर्ज पर बनाई सरकार में कड़वे अहसास भी बहुत होते हैं। उन्हें याद आया होगा कि अपनी उदार छवि के चलते देश को उनसे कितनी उम्मीदें थीं, जब वे मुख्यमंत्री बने थे। जम्मू-कश्मीर नेताओं के अब तक पाक राग के बीच उदार और साफ दिखती छवि के आजाद नई जिम्मेदारियों से रूबरू थे। लेकिन आज उनके लिए आत्म मंथन का समय है कि अब देश उनके बारे में क्या सोचता है। उनकी राष्ट्रीय छवि एक राज्य के अपने आईने में कितनी धुंधली हुई। अफजल गुरु के बचाव में बोलने से देश में उनकी छवि कितनी मलिन हुई होगी। अगली सीढ़ी पर उन्हें महसूस होना चाहिए कि उन्होंने किस तरह खुद को कश्मीर जाकर, किस तरह संकीर्ण सांचे में फिट कर, किस तरह महफूज समझ लिया था।अंतिम सीढ़ी पर उन्हें अहसास होना चाहिए था कि अब वे अगले आम चुनाव में जब कांग्रेस के प्रचार के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में जाएंगे, तो क्या वहां लोगों की सुलगती आंखें उनसे सवाल नहीं करेंगी?
लेकिन यह भी उतना ही कटु सत्य है कि नेताओं की महसूसने की शक्ति कितनी दुर्बल होती है। अहसासों का कत्ल कर ही वे सच्चे नेता कहलाने के लायक बनते हैं।

July 05, 2008

रोम जला, नीरो ने बजाई बांसुरी

जब रोम जल रहा था, तब नीरो बांसुरी बजा रहा था। नीरो ने गलत क्या किया? जिस बेसुरी बांसुरी में फटे सुर निकलें, उसे और किस मौके पर बजाया जा सकता है। कम से कम ऐसे मौके के बहाने बांसुरी को लोगों ने देखा तो सही। वैसे कहावत में कितना दम, पता नहीं। लेकिन हम नई कहावत आंखों के सामने गढ़ी जाते देख रहे हैं। देश में जलने से कमतर हालात नहीं हैं और सारे नीरो (राजनीतिक दल) अपनी-अपनी बांसुरी बजाने में मशगूल हैं। साम्प्रदायिक आग के शोले भड़क रहे हैं। कई जानें जा चुकीं। आतंकाकारियों से लोहा लेते जवान रोज शहादत को प्राप्त होते हैं। इधर, आम आदमी भी कोई कम शहादत की स्थिति में नहीं है। शहीदाना अंदाज में सिर पर कफन बांधे घूम रहा है। बावजूद इसके सबका एकमेव एजेण्डा खुद के अस्तित्व को सलामत रखने की बेशर्म और स्वार्थ से भरी शतरंजी चालें चलने की खोज है।
औचक सारी समस्याएं सरकार की प्राथमिकता से डिलीट हो गई हैं। उसके एजेण्डे में एकमात्र तरकश है- डील। सपा से लेकर अमरीका तक, डील का डोल जमाने की फिक्र छाई है उस पर। इस समय देश में जैसे राजनीतिक हालात हैं, उसमें राजनीतिक दलों की नग्नता साफ दिखने लगी है। अब तक जिनको जिनका मुंह तक देखने से एलर्जी थी, अब मुंह दिखाई में पूरी सरकार सौंपने को आतुर हैं। यह आतुरता, जनता की अधीरता बढ़ा रही है। धैर्य की कठिन घड़ी है। इनकी बेशर्म, बेमेल गलबहियां उन सारी समस्याओं के गाल पर करारा तमाचा है, जो देश को भयाक्रान्त किए हुए हैं। लेकिन इन सबकी इन्हें कोई फिक्र नहीं। माहौल एकाएक समझौता प्रधान सा हो चुका है। मानसूनी बादल अवसरों के टुकड़े लेकर घूम रहे है। हर दल इन्हें लपकने के पूरे मूड में है। प्रधानमंत्री बनने को आतुर एल के आडवाणी ने भी सरकार को चेतावनी दी है कि वह संसद में बहुमत साबित करे। ...और उसके पास बचा ही क्या है साबित करने को। बाकी सब कुछ साबित हो चुका, बस अब एक बहुमत ही साबित करना है उसे। बाकी मोर्चों पर तो लोग उसे देख ही चुके हैं।
सरकार की डील को अंतिम परिणति तक पहुंचाने की जो जिद सामने आई है, उसमें समूचा देश हाशिए पर खिसक चुका है। करोड़ों लोगों की बद् दुआएं भी इनकी आत्मघाती जिद के आगे बेअसर हैं। न इनको महंगाई की फिक्र है, न मौजूदा भड़कते दंगों की। तेल की बू लोगों को परेशान किए है। रसोई गैस समूचे देश के पेट में आफरा ला चुकी है। सरकार के पास कोई तात्कालिक हाजमोला नहीं, जो इस आफरे को ठीक कर सके। हर वह जो चीज है और आम आदमी के जरूरत की है, बढ़ने की ठाने हुए है। महंगाई चौबारे चढी है। सरकार चुपके से पिछवाड़े उतर रफूचक्कर हो चुकी है। सत्ता प्रतिष्ठानों के पिछवाड़े हंसी की गूंज है, शायद वहां नए सारथियों के स्वागत-सत्कार के बहाने, भविष्य की शतरंज पर हाथी-घोड़े चलने की चालें खोजी जा रही है।

July 04, 2008

बेहिसाब, बेसाख्ता, नौटंकी जारी है... देखते रहिए

इस समय देश में अजीब सी खामोशी है और सन्नाटे का हृदयभेदी शोर है। देश के आकाश में मानसूनी कम, किसी अनिष्ट की आशंका के बादल ज्यादा तैर रहे हैं। सियासत में बेतुके फैसलों की घड़ी है। कई पार्टियों के अंगने में मौसम सुहावना हो चुका है, वहां गुंजाइशों-संभावनाओं के फूल खिलने की भीनी-भीनी खुशी तैर रही है। तो किसी-किसी अंगने में कैकटस उग रहे हैं। रोज कोई कांटा सा उगता है, पर पता नहीं राजनेताओं की मोटी त्वचा उस चुभन को महसूस करती है कि नहीं। आम आदमी रोज उस चुभन के साथ जगता है, और दवा बन चुकी पुरानी पीर के साथ सोता है।
देखें तो इस समय सारे ज्वलंत मुद्दे रद्दी को टोकरी में डाले जा चुके हैं। एकमात्र बेकरारी परमाणु करार को लेकर है। जहां घोड़ी चढ़े दूल्हे की तरह तोरण मारने जैसी उत्कंठा के शिकार हैं पीएम और उनके पार्टी बाराती। वामदलों की समर्थन वापसी की दीर्घकालीन धारावाहिकी धमकियों का सम्भवतः तीन दिन बाद समापन हो जाए। क्योंकि कांग्रेसनीत यूपीए को अब नया सारथी मिलने की अघोषित खुशियां दस जनपथ से बाहर छलक मीडिया के आंगनों में गिरने लगी हैं। यूएनपीए की राष्ट्रीय बहस का मुद्दा भी शिगुफा भर ही निकलने वाला है। यह सिर्फ इसलिए, ताकि जनता को बहस के वहम में डाल चुपके से सरकार के पाले में समर्थन की बॉल डाली जा सके। अब तक एक कदम बढ़ाकर, दो कदम पीछे खींच लेने की आदी रही सरकार के मौजूदा आणविक दुस्साहस पर गौर करें, तो यह लगभग तय है कि उसका नया साथी कौन है? एकबारगी इस मुद्दे को परे कर के देखें कि करार देशहित में या विरोधी, तो जो आईना सामने आ रहा है उसमें भी किस गर्व के साथ चेहरा देखने की खुशफहमी पालें?
क्योंकि देश के आकाश में सब हवाई किले जैसे निर्माण किए जा रहे हैं। जहां जनता की नजर में ये सब रेत के किले भर हैं। कोई ठोस आकार-प्रकार नहीं। कोई ऐसी आकृति नहीं, जो यथार्थ के धरातल पर टिकी हो। कोई छद्म धर्मनिरपेक्षता के ईंटों से बनाया गया है, तो कहीं उसमें उग्र हिन्दुत्व का गारा मिला हुआ है। एक का मकसद भुलावे और भ्रम का माहौल बनाए रखना है, तो दूसरे का मरियल बाजुओं में जोश की लहरें पैदा कर वोट तक पहुंचाने की कोशिश भर है। लेकिन धोखे और दिखावे की नींव पर टिके ये किले अवाम को कोई राहत पहुंचाने वाले नहीं है। अवाम के सिर तिक्त धूप के टुकड़ों में झुलसते रहेंगे। यह तय है।
अब न महंगाई मुद्दा है, न उछाल मारता शेयर। शेयर का उछाल रूटीन की खबर भर रह गया है। सोने को इसलिए रोज याद करना पड़ता हैं कि देखें आज कितना चढ़ा। बाजार आपे से बाहर है, जनता अपनी औकात में रह...वाले मुहावरे के साथ अपनी हद में आ चुकी है। वह ऐसे चौराहे पर पहुंचा दिया गया है, जहां खुदकुशी के सिवाय कोई चारा नहीं। चारा होता, तो मौजूदा जारी तमाशे को मूकदर्शक की भांति देखती क्या? वह आंदोलन भी करती है तो इन्हीं पार्टियों द्वारा घोषित बंद की शक्ल में।

July 01, 2008

जाणता राजा (राजा सब जानता है)

कल रात जयपुर के सूरज मैदान में जाणता राजा देखा। जाणता राजा अर्थात राजा सब जानता है। यह छत्रपति महाराज शिवाजी पर बाबा साहिब पुरन्दरी लिखित भव्य नाटक है। इसमें शिवाजी की हिन्दवी स्वराज की कल्पना को खुले आकाश तले, विशाल, वास्तविक से लगने वाले मंच पर साकार किया गया। मंच किसी किले जैसा आभास देता था। संभवतः यह हिन्दुस्तान की पहली ऐसी महानाट्य प्रस्तुति होगी, जिसमें हाथी, घोड़े और ऊंटों का प्रयोग किया गया। यह नाटक देश प्रेम से ओत-प्रोत, तात्कालिक हिन्दुस्तान पर विदेशी आक्रान्ताओं की ज्यादती और स्वराज के लिए उनसे अकेले दम लोहा लेते छत्रपति महाराज शिवाजी की तड़प को अभिव्यक्त करने में कामयाब रहा।
तड़प तो वहां बैठे हजारों दर्शकों में भी कम नहीं थी। पूरा मैदान खचाखच भरा था। उससे ज्यादा दिलों में आग। कोई विरला ही दर्शक होगा, जिसके रोम कूपों से जोश की ज्वाला न निकली हो। रह-रह कर शिवाजी महाराज और महाराणा प्रताप के नारे भी लगे। खासकर, अफजल खान को शिवाजी द्वारा मारे जाने के दृश्य पर कई दर्शक मुट्ठियां कसे नजर आए। दरअसल आज के अफजल गुरु के स्मरण ने उनको बेचैन कर दिया और उन्होंने एक दूसरे को इस आशय का मैसेज भी भेजा कि उस अफजल खान को तो शिवाजी ने सबक सिखाया, लेकिन आज के इस अफजल गुरु की मौत की सजा पर आखिर कब तामील होगी। आज का स्याणा राजा कब फरमान सुनाएगा?
नाटक के दौरान एक ही सवाल मन में उमड़ रहा था। क्या आज का राजा सब कुछ जाणता है? या फिर सत्ता के इर्द-गिर्द की ऊंची दीवारों के पार वह कुछ नहीं जाणता। क्या यह काणा राजा है, जिसके आगे सब कुछ घटित होता है फिर भी इसे कुछ दिखाई नहीं देता। देखकर भी आंखें मुंदी होने का अभिनय करता है। यह अभिनय के उच्च शिखर पर है। देखकर मुंह फेर लेने का अभिलाषी है यह राजा। उस राजा का संकल्प था कि धरती उसकी पत्नी है, प्रजा उसकी संतान। और प्रजा को संतान की तरह ही पालित-पोषित किया। मगर आज का राजा सिवाय इसके क्या संकल्प ले सकता है कि यह कुर्सी उसकी रखैल है और प्रजा उसकी वोट बैंक। जिसे जब चाहे अपनी इच्छानुसार कभी भी मसल, कुचल सकता है। इसके दिल में सिर्फ सत्ता की वासना की हिलोरें मारती हैं। ये उद्दाम लहरें, सत्ता के गलियारों में टकराती रहती हैं।
उधर, प्रजा सिर फोड़ती है। सिर धुनती है। कोसती है। गालियां बकती है। इससे ज्यादा उसके हिस्से में कुछ है नहीं। लेकिन यह राजा कब जाणेगा?

June 30, 2008

हर्षाने का सुख, मुर्झा जाने तक

इस देश में मानसून का आना खुशियों का प्रतीक माना जाता है। इस दफा ये खुशियां ज्यादा देर तक कायम न रह सकें, शायद। आसमान से टप-टप पानी गिरेगा, लेकिन ज्यादा शोर भाषणों का होगा। रिमझिम बारिश के साथ सुनियोजित ढंग से तैयार किए गए स्वर झरेंगे। मेंढकों की जगह अजीब किस्म की टर्राहट सुनाई देगी। और लगभग शुरू भी हो चुकी है। या फिर फाइनल रिहर्सल जारी है। एक जोरदार स्क्रिप्ट लिखी जा रही है- फाइनल टच इस कामना के साथ कि एक-एक डायलॉग पर जनमानस दे ताली। यानी चुनावी प्रहसन के पट खुलने में अब देर नहीं है। कुल मिलाकर यह धैर्य धारण करने का वक्त है। रग-रग में शक्ति बटोरने पर्व है। यह हर्षाने का नहीं, मुर्झाने का वक्त है।
इसके बाद दर्शकों के हाथ में यानी वोटर्स के पास कोई चारा नहीं रह जाएगा। सिवाय इसके कि वह लोकतन्त्र के हवाले से एक और बेवकूफी कर डाले और जाति, धर्म, क्षेत्र के नाम पर बरगलाया जाकर सहर्ष खुदकुशी कर ले। सुसाइड नोट के नाम पर ईवीएम पर एक खास जगह अंगुली धर दे। अगले चुनाव तक उसके हाथ में यह बचा रहेगा कि रोज सुबह हड़बड़ाकर उठे, हाथ मले, जबड़ा कसे और मुट्ठियां भींचे। इस एक्सरसाइज के साथ वह नित्य फ्रेश हो सकता है।
लेकिन टर्राने वालों को कहां फिक्र है इस सबकी। उनकी आंखों में छलिया जैसी चाहत दिखने लगी है। उनकी आंखों में महंगाई की रफ्तार के बावजूद कहीं भी शर्मसार होने के चिन्ह नहीं दिखते। शर्मसार हों भी कैसें? गरीबों के नाम पर गरीब रथ चलाकर कोई कैसे शर्मिंदा हो सकता है। शर्म वे करें, जो उनकी सदाशयता पर अंगुली उठाते हैं, और डूब मरें। उनका आग्रह यह है कि किसानों की कर्जमाफी को चुनावी घोषणा पत्र समझा जाए और महंगाई को भूल के कूड़ेदान में डाल दें। सुबह-सुबह बढ़ती मुद्रास्फीति की खबर पर चाय का स्वाद कसैला न करे, बल्कि यह देखें कि सरकार में शामिल दल साम्प्रदायिक ताकतों के खिलाफ किस हद तक एकजुटता से डटे हुए हैं। अब वे करार पर रार इस बिना पर ठान सकते हैं कि उनको नया साथी मिलने का गणित कथित देशहित के फॉर्मूले पर भारी है। यह चुनाव की वेला में, सत्ता के गलियारों में फिर से फूल खिलाने की उम्मीद को लेकर ज्यादा अपीलिंग मैटर है।
एक दल इसलिए खुद की पीठ ठोक-ठोक मजबूती अनुभव कर रहा है कि उसके तरकश में एक साल से प्रधानमंत्री नामक तीर बेकार पड़ा है और बेध सकने लायक कुर्सी खाली नहीं कर रहा कोई। जो उस पर धंस, देश को पांच साल स्वास्थ्य की कामना करते रहने का अवसर दे सकता है। हो सकता है बाकी कुर्सियों पर भी फिट हो सकने लायक जीवों के नाम भी तय हों। इनके घोषणा पत्र में भी परेशान हाल आदमी के लिए कोई नया मंत्र नहीं है। इनके पास प्रत्याशी तय हैं और बस, इसे ही घोषणा पत्र का प्रारूप समझ एक अदद दाद दे दें।
कुल मिलाकर सरकार मृत्यु शैय्या पर है और आम आदमी कीलों की शैय्या पर लेटा अनुभव कर रहा है। अब तो उसके पास मर्सिया गाने की ताकत भी शेष नहीं। देश में उदासी का आलम है, राजनीतिक दलों के आंगन को छोड़कर जहां, प्रत्याशी तय कर लेने की बेशर्म हंसी तैर रही है।

June 28, 2008

ट्रेन टु विलेज-२

(मेरी गांव यात्रा)
परसों गांव जाने के अपने अनुभव शेयर कर रहा था। कुछ ब्लॉगर साथियों ने टिप्पणियां भेजीं। लगा, सफलता की कहानी कहीं भी गढ़ ली जाए भले, स्मृतियों से गांव कभी छूट नहीं सकता। शहरों में आकर रच-बस गए लोगों की शिराओं में आज भी गांव खून बनकर दौड़ते हैं। हो सकता है हमें इस बात की खबर ही न हो कि हमारी यादों में वही गांव आबाद है, जिसे कभी अलविदा कह आए थे। हमारे साथ-साथ पलते-बढ़ते हैं। इतना जरूर है कि उन स्मृतियों पर शहरी चकाचौंध की गर्त छा गई है। व्यस्तता का बहाना है। समय नहीं मिल पाने के बहुतेरे किस्से-कहानी जुबानी हैं। गांव उन लोगों की आज भी राह तकते हैं, जो सफल पुरुष तो बने, लेकिन लौटकर नहीं गए। जबकि वे वादा करके आए थे। कसमें खाईं थीं। पढ़ाई के लिए या कमाने-धमाने के लिए गांव छोड़ते वक्त, बड़े-बुजुर्गों से, माता-पिता से, युवा साथियों से, खेत-खलिहानों से, गलियों से, सौंधी मिट्टी से, ढोर-ढंगर से एक अलिखित वादा किया था। कितनी ही नेमतों की गठरी बांध विदाई ली थी। कहा था-कुछकर बनकर लौटेंगे। अपनों के बीच, चौपाल पर बैठकर, बड़े-बुजुर्गों के हुक्के की गुड़गुड़ाहट के बीच सफलता की स्वाद भरी कहानी सुनाएंगे। ...लेकिन अफसोस। ऐसा हो न सका। आज हालत यह है कि हमने ही गांवों पर पिछड़ेपन का टैग चिपका दिया है और अब अपने बच्चों को गांव ले जाने से इसलिए कतराते हैं कि कहीं वे गांव के बच्चों के संग घुल-मिल न जाएं। या उनकी परीक्षाएं डिस्टर्ब हो सकती हैं। कुछ गंदी आदतें न सीख लें। मिट्टी में न सन जाएं?
लेकिन क्या मिट्टी पराई हो सकती है? मैं पन्द्रह रोज पहले गांव पहुंचा, तो मुझे उसी मिट्टी से किया वादा याद आ गया। इस बार मुझमें गांव को लेकर जरूरत से ज्यादा अकुलाहट थी, एक बेचैनी थी। टूटकर बिखर जाने की जिद सी आकार ले रही थी। इसके कारण तो खैर, शहर में जन्मी कुंठाओं से उपजे थे। कैमरा साथ ले गया था, एक-एक क्षण को अविस्मरणीय बनाने को। मैं बरसों बाद जीना चाहता था। भरपूर जीने की चाहत दिल में बसाए ही इस यात्रा की शुरुआत की थी। अपनी मिट्टी में पहुंचते ही मैं बचपन में लौट चुका था। मेरा वर्तमान कहीं नहीं था। बस, मैं और मेरा गांव था। मैंने वो सारी गलियां नापी। सारे संगी-साथियों से मिला। खेतों की डगर चला। पगडंडियों पर घूमा। पेड़-पौधे देखे। कुछ पेड़ और घने, छायादार बन चुके थे। पौधों में भी रवानी थी, अपनी जवानी पर इतरा रहे थे। घर में दसेक अनार के पौधे लगे हैं। इतने छोटे पौधे और अनार से लदे-फदे। देखकर सुखद अनुभूति हुई। अमरूद भी सैकड़ों की संख्या में लगे थे। बोझ के मारे टहनियां धरती को छू रही थी। अहा, इतनी विनम्रता, सदाशयता यदि इन्सान में आ जाए तो क्या कुछ हो सकता है, यह अकल्पनीय है।
मैंने पेड़-पौधों के संग खूब फोटो खिंचवाई। वे भी खूब मन से लिपटे। झूम-झूमकर स्वागत-सत्कार कर रहे थे। स्कूली पढ़ाई के दिनों में अपनी भैंस का दूध मैं ही निकाला करता था। सो, इस बार भी बाल्टी लेकर बैठा दूध निकालने। लेकिन भैंस ने अजीब नजरों से देखा और फिर दूर जा खड़ी हुई। उसे मैं अपरिचित लगा। यह चाह पूरी नहीं कर पाया। दस साल में पहली बार मुझे इस तरह की हरकतें करते देख मम्मी-पिताजी खूब हंसते रहे। उस हंसी से मैं जितना आल्हादित हुआ, बयां करना मुश्किल है।
गांव की रातें शीतल होती हैं। छत पर सोने का आनन्द निराला ही है। रात को जिन्दगी से भरी मंद-मंद बयार बहती है। तनाव से अकड़ी सारी नसें खुल जाती हैं। शहर में दो पल लॉन में बैठ जाओ, तो मच्छर धावा बोल देते हैं। शहर में शाम सुहानी नहीं आती, मच्छर भगाने की दुश्चिंताएं लेकर आती है। और वहां निर्मल सी हवा तैर रही थी। मैं उसे फेफड़ों में इस हद तक भर लेने को आतुर था कि पता नहीं फिर ऐसा मौका मिले या नहीं। वहां एक भी मच्छर नहीं था। ताजगी भरा वातावरण था। शहर में सात घण्टे सोकर भी सुबह जल्दी उठने का मन नहीं करता। वहां देर से सोकर भी प्रातःकाल जल्दी आंख खुल जातीं। कभी थकान महसूस नहीं हुई। कभी लगा ही नहीं कि किसी पार्क में जाकर टहलने की जरूरत है। या तनाव मुक्त करने के लिए किसी हास्य क्लब में जाकर क्षण भर के लिए हा-हा-हा करने की आवश्यकता है। शहर में हमने जिन्दगी से हंसी को निकाल दिया है। वहां तो हंसी स्वयंमेव चेहरों पर तैरती है। इस नैसर्गिक आनन्द को में कभी भुला नहीं सकता।
दोस्तों, मैं यह सब इसलिए नहीं लिख रहा हूं कि मैंने कोई नया काम कर डाला है या गांव कोई दुर्लभ चीज है। मैं यह सब इसलिए लिख रहा हूं कि जहां हमारी आत्मा रचती-बसती है, उस जगह के प्रति हम दिल से आभारी बनें। और यदि दिल लगाया जाए तो कोई गोवा, कोई देहरादून, कोई शिमला, कोई काठमांडू या मलेशिया, मॉरिशस वह आनन्द नहीं दे सकते, जो गांव दे सकते हैं। आज घूमने का अर्थ किसी पिकनिक स्पॉट या विदेश भ्रमण हो गया है। ऐसे में हमें कहने की जरूरत है- आओ गांव चलें। हो सके तो प्लीज, गांव को जिन्दगी से मत निकालिए।

June 26, 2008

ट्रेन टु गांव

(मेरी गांव यात्रा)
शहर में मन ऊब चला, तो गांव चला गया। सोचा, चलो फ्रेश हो लेंगे। (कभी-कभी गांवों की यही उपयोगिता महसूस होती है। क्योंकि गांवों में भी अब पहले जैसा कुछ नहीं रहा। लेकिन गांव फिर भी गांव हैं।) खैर, दस दिन गांव रह कर लौट आया हूं। सात दिन हो गए शहर आए। अभी तक गांव की स्मृतियों से बाहर नहीं निकल पाया हूं। मन वहीं किसी खेत में छूट गया है। पिछले कुछ वर्षों में ऐसा पहली बार हुआ है। वर्ना होता यह था कि शहर से ऊबकर गांव जाता और फिर जल्द ही वहां से ऊब शहर का रुख कर लेता। लेकिन इस बार वैसा नहीं था। पहले से ही तय था कि इस बार गांव को भरपूर जीना है। उन गलियों की यादें ताजा करनी हैं, जहां हम बचपन में खेले-कूदे। उन खेतों की, मैदानों की, गली-कूचों की तस्वीर को एक बार पुनः ताजा करना है। उन किशोरों-युवाओं से खूब घुलना-मिलना है, जो तब कमीज की बांह से नाक पौंछते थे। मतलब यह कि पूरी तरह बचपन में लौट जाऊंगा। भूल जाऊंगा कि मैं वर्तमान में क्या हूं, कहां हूं, क्या कर रहा हूं। इच्छाओं-महत्वाकांक्षाओं-सपनों की गठरी को उतार परे धर दूंगा। बोझमुक्त हो इतना हल्का, इतना हल्का हो जाऊंगा कि मौजूदा मैं से एकदम बाहर निकल जाऊंगा। मैंने शुरूआत लोकल ट्रेन से की। बस से चार घण्टे में त्वरित पहुंचने की बजाय ट्रेन में छह घण्टे का सफर ज्यादा मजेदार लगा। इधर धीमे-धीमे ट्रेन चली। मैंने खुशवंत सिहं की ट्रेन टु पाकिस्तान निकाली। सफर में पढ़ने का इरादा इतना ज्यादा हावी था कि शरद जोशी की दिन प्रतिदिन और कमलेश्वर की कितने पाकिस्तान भी साथ थी। और रास्ते में १०० पेज पढ़ भी डाले। (बचे हुए पेज शहर में आने के बाद आज तक शुरू नहीं हो पाए हैं)। साथ ही इतना चौकन्ना भी रहा कि पैसेंजर ट्रेन में सफर का कोई आनंदित करने वाला क्षण चूक न जाए। ट्रेन के साथ दौड़ते पेड़-पौधे, शहर-गांव सबको भरपूर मन, सजग निगाहों से देखता रहा। बचपन में देखी-पहचानी चीजों को देखता तो मन खुशी से उछलने लगता। बस, यह मलाल रहा कि अकेला होने की वजह से यह खुशी समूचे रास्ते अव्यक्त सी रही। पर मैं इस खुशी को अन्तस में इतना भर लेने को उत्कंठित था कि शहर में मिले सारे तनाव, परेशानियां कुछ समय के लिए सही, गायब हो जाएं। ट्रेन में फेरिवाले से खरीदकर नमकीन खाई। पलसाना की स्टेशन पर आइस्क्रीम का लुत्फ उठाया। चौमू की स्टेशन पर सूखे बेर खाए। सीकर में पेठे, तो झुझुनूं स्टेशन पर उतरकर बाहर आते ही दो पेड़े खरीदने का लोभ संवरण नहीं कर सका। उस स्वाद के प्रति इस आग्रह को देखकर महानगर से ईर्ष्या सी हो उठी, जहां अपने ही भीतर को मारने पर तुले हैं। स्वाद भीतर ही है, बस मौजूदा जिन्दगी की रफ्तार, काम, जबरियां इच्छाओं-महत्वाकांक्षाओं ने उस नैसर्गिक स्वाद को कसैला बना दिया है। अन्तःकरण का स्वतः स्फूर्त अनुभूतियों का सोता सूख सा गया है। हम महसूस करने की शक्ति खो बैठे हैं।
अब प्राथमिकताओं में आगरे के पेठे का स्वाद या चौमू का झड़बेर नहीं आता। न ट्रेन की सख्त बेंच पर बैठे-बैठे खाई जाने वाली आइस्क्रीम है। अब फ्लेवर्ड आइस्क्रीम का आग्रह है, क्योंकि जहां हम बैठे हैं वहां और लोग भी ऑर्डर कर रहे हैं। पड़ौसी के बच्चों को इतने फ्लेवर याद हैं कि सुनकर हम घबरा उठते हैं। शहर में पन्द्रह किलोमीटर पावभाजी खाने इसलिए चले जाते हैं कि अमुक पावभाजी वाला मक्खन ज्यादा लगाता है या पड़ौसी भी वहां जाते हैं। जरा कल्पना कीजिए, क्या रोटियों में मां के हाथ से डले उस मक्खन के स्वाद का दुनिया की कोई भी पावभाजी या पित्जा-बर्गर मुकाबला कर पाएंगे। खैर। समूचे रास्ते, छह घण्टे आनन्द से भरता रहा। काश, यह सफर रोज यूं जारी रह सके। लग रहा था जैसे बचपन की फिल्म रिवर्स चल रही है।

June 02, 2008

कल रात आपने क्या देखा?

मैं रात्रि में अस्पताल में भर्ती एक रिश्तेदार के पास था। लेकिन मैच का ताजा स्कोर जानने की प्रबल उत्कंठा का शिकार था। मेरा बीमार रिश्तेदार ब्रेन हैमरेज के बावजूद एक लम्बी चैन की नींद में था, लेकिन मैं? मेरी दिमागी नसों में दौड़ते लहू को महसूस कर सकता था। दो नीरस और इकतरफा सेमीफाइनल के बाद रोमांच से भरे फाइनल की उम्मीद कम थी। उम्मीद थी तो सिर्फ इसलिए कि शेन वार्न अपनी फिरकी के इस्तेमाल के साथ-साथ दिमागी गुगली से भी विपक्षी टीम को मात देने की कोशिश करेंगे। वहीं, महेन्द्रसिंह धोनी भी मैदान पर रणनीति और जोश के समिश्रण से राजस्थान रॉयल्स को आसानी से ताज नहीं पहनने देंगे। हुआ भी वही। बार-बार फोन कर एक मित्र से बराबर जानकारी ले रहा था। आखिरी ओवर्स में तो मोबाइल चालू रखा और उससे बॉल दर बॉल हाल सुनता रहा। अन्तिम ओवर में मैंने जो बेचैनी महसूस की, कल रात आम क्रिकेट प्रेमी भी उससे बच नहीं पाया होगा। मैंने महसूस किया, मेरी धड़कनें तेज हो रही हैं। दिमाग में उथल-पुथल मची है। मैं इसे नजरअंदाज करने की भरपूर चेष्टा कर रहा था। अस्पताल की उस सख्त बेंच पर करवटें बदलते देख कोई भी मेरी बेचैनी की हालत को साफ-साफ पढ़ सकता था। ऐसा हुआ भी। पास के एक-दो लोगों ने मेरे चेहरे के उतार-चढ़ावों को नोट किया और उत्सुकता से देखा। मैं क्रिकेट को जुनूनी अंदाज में नहीं लेता। इसलिए मैं खुद मेरी हालत पर चौंक रहा था। लेकिन पैंतालीस दिन के आईपीएल तमाशे के बाद फाइनल मैच तक आते-आते जो स्थित बन रही थी, क्या वह ट्वंटी-२० क्रिकेट की बेतहाशा लोकप्रियता का नमूना नहीं था? तमाम आशंकाओं के बावजूद कल रात हर बॉल के साथ यह नौटंकी हिट हो रही थी। शुरू में इस क्रिकेट में भावनाओं को खारिज कर देने वाले लोग स्वयं भावनाओं पर काबू नहीं रख पाए होंगे। शोहेल तनवीर को पिटता देखने के आकांक्षी रहे लोग, वे याचक की मुद्रा में उससे दो रनों की कामना कर रहे थे। यह क्रिकेट में नया ऐरा की धमाकेदार दस्तक है। क्या आपने सुनी? किसी चीज के परिणामों तक उस पर संशय रहना लाजिमी है। आईपीएल को लेकर भी कुछ ऐसा ही था। कुछ अनिश्चय के शिकार इसके आयोजक भी रहे होंगे, इसलिए चीयर लीडर्स को नचाने से लेकर बॉलीवुड कलाकारों तक का तड़का लगाया गया। शुभंकर को रोचक तरीके से पेश किया गया। बांस पर चढ़े बीस फुट आदमी को खड़ा कर इस क्रिकेट को भी ऐसे खड़ा करने के सौ-सौ जतन थे। शुरुआत में लोगों ने इसे क्लासिक क्रिकेट के खात्मे के रूप में देखा। लेकिन इसकी लोकप्रियता के ज्वार में सारी आशंकाएं बह गई। अब कुल लब्बोलुआब यह है कि यह एक तीन घंटे की मशाला पिक्चर की तरह सामने आईहै, फिर भी पूरी तरह पारिवारिक। पूरे परिवार के एक साथ बैठकर देखने लायक। पूरी रुचि लेकर इसे देखा जा सकता है। पांच दिन के उबाऊ और एक दिन बर्बाद करने वाली क्रिकेट से परे इसका अलग ही सुख है। शाम को ऑफिस से लौटकर भी बच्चों के संग स्टेडियम जाया जा सकता है। भेलपुरी-पावभाजी उदरस्थ करें और स्टेडियम में घुस जाएं। तीन-साढ़े तीन घंटे में खेल खत्म, पैसे हजम। आ, अब लौट चलें।

April 19, 2008

क्रिकेट में ड्रामा, ड्रामे की क्रिकेट

इसमें एक्शन है। ड्रामा है। सितारे हैं। राजनीति है। बिल्लो रानी का डांस है।...और क्रिकेट भी है। आईपीएल का तमाशा है ही ऐसा। आदमी क्रिकेट से बोर नहीं हो सकता। बोर होगा, तो बिल्लो रानी को देखने लगेगा। बिल्लो रानी ढंग से नहीं ठुमकी तो वीवीआईपी दीर्घा की ओर गर्दन उचकाकर सितारों को देख लेगा। देशी में दम ना हो तो फॉरेर्नर चीयर गर्ल भी तो हैं। डांस समझ में नहीं आए तो चिकनी टांगे ही काफी हैं मन लगाने को। यहां सब कुछ देखने की चीज है। और तबीयत से देखा जा सकता है। फुल्ली एंटरटेन है।
आईपीएल नाम का यह तमाशा कई प्रकार के मसालों से बनी खिचड़ी है। नूडल्स है। पित्जा है। बर्गर है। सब कुछ है। कुल मिलाकर सुस्वादु सा मामला बन गया है। यह बड़ी बात है कि आज सब कुछ महंगे के बावजूद सुस्वादु चीज भी परोसी जा रही है। कम से कम ४४ दिन तक दिल लगी का सा खेल चलता रहेगा। देश को, देश के कृषि मंत्री के प्रति शुक्रगुजार होना चाहिए कि उन्होंने मंत्री पद की जिम्मेदारी के बीच, प्रधानमंत्री बनने के ख्वाबों के बगीचे में दिन-रात टहलते हुए, किसानों की कर्जा माफी का यश लूटने के पुरजोर प्रयासों और सोनिया प्रधानमंत्री पद से दूर रहें इस किस्म की राजनीति के बीच भी क्रिकेट के लिए इत्ता कुछ कर डाला। और करते रहेंगे।
यहां कुछ बुनियादी सवाल खड़े हो गए हैं। यह क्रिकेट है या तीन घंटे की बॉलीवुड फिल्म है। वैसे यह समझने में माथापच्ची करने की कोई जरूरत नहीं। जिनको क्रिकेट समझ में नहीं आती, वे फिल्म के तौर पर देख सकते हैं। और जिनको फिल्म से परहेज है, वे क्रिकेट समझ तीन घंटे मजे से बिता सकते हैं। जिनको दोनों से एलर्जी हो, वे अक्सर कला प्रेमी लोग होते हैं। उनके लिए मजा यह है कि वे चियर गर्ल के डांस में कला के तत्व खोजने की मशक्कत कर सकते हैं। ...और जो तीनों तरफ से रूखे से आदमी हैं, वे तीन घंटे भीड़ का हिस्सा बन इस जिग्यासा में गुजार सकते हैं कि आखिर यहां हो क्या रहा है? हर बंदे के लिए मामला काफी रोचक है। पता भी नहीं लगे और सब कुछ पता भी लग जाए।
दूसरा कठिन सवाल यह उभर रहा है कि जिसका उत्तर खोजा जाना जरूरी है। शाहरुख, प्रीति जिंटा वगैरह भविष्य में भी टिकट बेचते रहेंगे या एक्टिंग वगैरह में भी लौटेंगे। और मान लीजिए टिकट ही बेचते रहे, सारे मैचों में मौजूद रहे तो फिर फिल्मों क्या होगा। यदि क्रिकेट में मन रम गया तो, शाहरुख कोलकाता से ओपनिंग कर सकते हैं। शाहरुख ओपनिंग में उतरे और मोहाली से मैच हुआ तो प्रीति जिंटा गेंदबाजी में हाथ जरूर आजमाएंगी। फिर तो प्रीति गेंद फेंकेंगी और शाहरुख दिल की तरह गेंद को उछाल कैच आउट हो सकते हैं। मामला तब और भी पेचीदा हो सकता है, जब अभिनेता और अभिनेत्री इतनी बार आमने-सामने हुए कि दोनों प्रतिस्पर्धा भूल दिल लगा बैठें और पिच पर ही एक-दूसरे की बाहों में समा जाएं। कुछ भी संभव है।
यदि सितारों ने क्रिकेट सीखा, तो युवराज, धोनी, गांगुली वगैरह इनके संग रह-रह एक्टिंग जरूर सीख जाएंगे। (वैसे अब भी क्रिकटे से ज्यादा एड वगैरह में एक्टिंग करते हैं)। इस तरह इस क्रिकेट में कई खतरे हैं, तो मजे भी हैं। हो सकता है पंवार साब आगे चल प्रधानमंत्री बन जाएं, तो क्रिकेट के लिए काफी कुछ कर सकते हैं। क्रिकेट सीखने पर सब्सिडी दे सकते हैं। जिन देशों की यात्रा निकलेंगे, वहां क्रिकेटर्स को भी साथ ले जाएंगे। मैचों के जरिए मैत्री को प्रगाढ़ करेंगे। मुशरर्फ को क्रिकेट के मैदान में चुनौती दे सकते हैं। आने वाले कुछ दिनों तक देश वासियों को ऐसे-वैसे ही खयाल आते रहेंगे। लगेगा, यह देश पंवार साब और उनका बोर्ड ही चला रहा है।