December 06, 2014

श्रद्धा सुमन कुबूल करना, मित्र!

प्रधानमंत्री मुग्ध हो सकते  हैं कि उन्होंने ओबामा को गणतंत्र दिवस पर आमंत्रित कर विरोधियों को एक ही झटके में निपटा दिया है। उनका आत्मविश्वास कहता है कि वे घाटी में 'कमल' खिलाकर विरोधियों को दूसरी बार फिर पीटेंगे। तो दूसरी ओर सरकार के मंत्री 'रामजादों' की परिभाषा तय करने में लगे हैं। कुछ को मरोड़ यह उठ रही है कि मोदी नाम के बढ़ते 'हुदहुद' को कैसे रोका जाए और भानुमति का कुनबा जोडऩे के लिए कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा एकत्र करने में लगे हैं। कुछ ऐसे भी हैं, जो प्रधानमंत्री के विदेश दौरे की प्रतीक्षा में अपने शब्दकोश में आलोचनाओं के नए मुहावरे गढ़ रहे हैं, तो उनकी चिंता यह है भी कि पूर्णकालिक विदेश मंत्री होते हुए भी पीएम खुद ही विदेश मंत्री के अवतार में क्यों नजर आते हैं। सबके अपने-अपने मुहावरे, एजेंडे और सीनाजोरी है। इससे किसी को क्या कि संसद ठप है, बहिष्कार है, काली पट्टियां, काली शॉल और बिना बारिश की आशंका के काले छाते तने हुए हैं। किसी की मराठी मानुष की अस्मिता 'कुर्सियों' की बलिवेदी पर ढेर हो रही है! कुल मिलाकरर सबकी अपने अस्तित्व की छद्म लड़ाइयां हैं, शह-मात के प्रपंच हैं। अपने-अपने आलाप की मुद्रा में लीन इन सबको क्योंकर खबर होगी कि मेरा एक मित्र शहीद हो गया है। सुदूर छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के घात लगाकर किए गए हमले में दर्जन से अधिक जवान गोलियों के शिकार हो गए, जो तकनीकी रूप से 'शहीद' कहलाते हैं।
उस सूची में एक नाम राजेश कपूरिया भी था। कल रात को यह खबर फेसबुक पर पढ़ी, तो सन्न रह गया। नाम सुनकर झटका सा लगा-राजेश कपूरिया! मैं उस राजेश को जानता हूं, जिससे एमए की पढ़ाई के लिए जयपुर पदार्पण पर प्रथम बार मिला था।
दिमाग में 16 साल पहले का वह दृश्य कौंध गया, जब मैं एक बैग और बिस्तर लेकर जयपुर-लुहारू पैसेंजर ट्रेन से उतरकर किसी का इंतजार कर रहा था। वहां पहले से ही जयपुर आकर अध्ययन कर रहा एक मित्र मुझे लेने आने वाला था। वादे के मुताबिक वह तय समय पर जंक्शन पर नहीं मिला, तो मेरी जान सूख रही थी। किससे पूछूं, किधर जाऊं? बार-बार जेब में पड़े मुड़े-तुड़े एड्रेस को पढक़र किसी से पता पूछने की कोशिश कर रहा था कि तभी किसी ने पीछे से धौल जमाई। मैंने हड़बड़ाकर पीछे देखा, तो मित्र को देख तसल्ली हुई। उसने साथ आए नौजवान से परिचय कराया- यह है राजेश कपूरिया! हम अस्थाई तौर पर दसेक दिन राजेश के आवास पर रुके, जो सम्भवत: उसके कश्मीर में तैनात फौजी पिता के नाम से अलॉट था। इस दौरान इतना जान पाया कि वह भी झुझुनूं के किसी गांव का रहने वाला है, कॉमर्स कॉलेज में पढ़ता है और मिलिट्री ज्वॉइन करने की ख्वाहिश रखता है, इसके लिए वह फिजिकल एक्सरसाइज से ज्यादा इंग्लिश से जूझ रहा है। दो बार सीएसडी की एग्जाम क्लियर कर इंटरव्यू दे चुका है और तीसरी बार भी आश्वस्त था। मैं अपने संकोची स्वभाव से बाहर निकल उससे याराना कायम करता, उससे पहले ही हमने अलग कमरा किराए पर ले लिया। उसके बाद यदा-कदा राजस्थान विश्वविद्यालय में वह नजर आया। खासतौर पर लाइब्रेरी में। जब भी बात हुई, इंग्लिश से शुरू होकर इंग्लिश पर ही खत्म हुई। वह तो इस निष्कर्ष पर भी पहुंच चुका था कि शेखावाटी के आदमी को बाहर निकलने पर दो चीजें सबसे ज्यादा परेशान करती हैं, एक तो लहजा, दुसरी इंग्लिश!
रात के 12 बज रहे थे और मेरे जहन में एक ही नाम तैर रहा था-राजेश कपूरिया! छोड़ो यार, नाम तो कितनों के ही एक जैसे हो सकते हैं-मन ने समझाया! लेकिन झुझुनूं दिल धडक़ा रहा था। उसकी तिरंगे में लिपटी तस्वीर को लैपटॉप में डाउनलोड कर कई एंगल से देखा, लेकिन उलझन बरकरार थी। फिर वह तो शांत लेटा था, दीन-दुनिया से बेखबर, जैसे बरसों बाद ढंग की नींद आई हो, न क्लांत, न श्रांत! मन ने किया, इसे ही जगाकर पूछ लूं कि क्या तुम वही राजेश हो, इतने दिन कहां गायब थे दोस्त? क्या इसलिए कि एक दिन अचानक आधी को इस रूप में सामने आकर उलझन में डाल दोगे? गूगल पर सर्च किया, तो भी कोई अन्य तस्वीर नहीं मिली। (जरूरी तो नहीं, गूगल हमारी हर शंका का समाधान करे ही।)
मन में तरह-तरह के खयाल उभर रहे थे। न्यूज में फौजी पिता का उल्लेख भी था। दिमाग ऐसी कई साम्यताओं के आधार पर नतीजे पर पहुंच रहा था कि यह वही राजेश है। लेकिन मन प्रतिकार कर रहा था, तेल रीते दीए की आखिरी लौ की तरह। बेचैनी का आलम यह था कि न आंखों में नींद थी, न तसल्ली! उद्विग्नता इतनी कि बस, बिना जाने यह रात न बीतेगी, न सुबह होगी! लेकिन आधी रात को किसे जगाकर पूछूं? तब के कोई दोस्त भी तो सम्पर्क में नहीं। रात इस उधेड़बुन में बीत गई। रातें बीत जाती हैं, वे सिर्फ आपके हिस्से की कहानी छोड़ जाती हैं। सुबह उठते ही झुझुनूं में दर्जनों परिचितों को फोन करने के पश्चात एक ऐसे मित्र के नम्बर मिले, जो विश्वविद्यालय में एकाधिक बार राजेश के साथ नजर आया था। फोन मिलते ही 'कुण-शुण' के बाद जब मैंने अपना परिचय देते हुए धडक़ते दिल से कहा कि मैंने कल कोई बुरी खबर पढ़ी है, तो उसके जवाब ने मुझे बिना पैराशूट ही आकाश से धक्का दे दिया- वो ई है सागी ही...राजेश शहीद हो गया!
मेरे पास तुम्हारी ज्यादा स्मृतियां नहीं हैं राजेश; एक बार छूटे, तो फिर कभी मिले भी नहीं। जिंदगी की जद्दोजहद में इतने आगे निकल आए कि कभी पीछे मुडक़र हमने 'छूटे' को टटोलने की कोशिश भी नहीं की। आज जब तुम्हारी खबर भी आई, तो इस रूप में! अब भी विश्वास नहीं हो रहा। कोई खबर को झुठला दे। मिलिट्री ज्वॉइन करने का जुनून, इंग्लिश में बेहद कमजोर होने के बावजूद उस पर फतह और सीआरपीएफ में असिस्टेंट कमांडेंट के रूप में सेवाएं देते हुए शहादत को प्राप्त हो जाना! कुल इतनी सी कहानी लगती है, लेकिन तुम बहुत कुछ कर गए हो। तुम मर कर भी 'जी' गए हो! मरे हुए तो वे हैं, जिनके पास इन अंतहीन लड़ाइयों के हल नहीं, करुण गाथाओं के उपसंहार नहीं।
सरकारों के पास पैकेज हैं, मेरे पास श्रद्धा के दो फूल हैं। मित्र, इन्हें स्वीकार करना!
तुम्हारे हिस्से का तुम कर चुके, हमारे हिस्से यही है!
पुनश्च: शेखावाटी में परिवारों में पीढ़ी दर पीढ़ी सैनिक होने की गौरवशाली परम्परा है। संयोग से पिता बच गए थे, दुर्भाग्य से बेटे नहीं बच सके या पौते!
(तस्वीर साभार- PilaniNews Pilani)

December 02, 2014

सिकुड़ती जमीन
- सुरजीत सिंह
वह पहले खेत हुआ करता था। देहयष्टि से भी और अपने गर्भ में उगाने वाली फसलों के लिहाज से भी। महज पांच-दस साल का संक्षिप्त सा समय गुजरा है और अब वह सिकुडक़र प्लॉट का एक टुकड़ा भर रह गया है। चारों ओर ऊंचे, कई मंजिला फ्लैट, मकान, बिल्डिंग बन गए। फॉर्म हाउस अस्तित्व में आ गए। आजकल शहरों के आस-पास फॉर्म हाउस क्रांति में तेजी हैं, यह पैसे वालों की मानसिक अय्याशियों का नतीजा हैं, जिनमें फसलें नहीं उगतीं, रिटर्न के लालच में निवेश के मनी प्लांट उगाए जाते हैं।
खेत के दूसरी तरफ कोने में किसी दिमाग की फूली हुई नसों के जैसा दुकानों का गुच्छा सा उभर आया है। पास में पानी की विशाल टंकी, बगल में फास्टफूड की दुकानें, डिपार्टमेंटल स्टोर, तीन तरफ फ्लैट और बिल्डिंगें! बीच में यह सिकुड़ा हुआ खेत! ताज्जुब है इसका बचे रहना और इससे बड़ा ताज्जुब है कि इसमें किसान ने अब भी थोड़े से टमाटर, मिर्च, बैंगन लगाने की जिद पाल रखी है। गोया खेत की आत्मा को जीवित रखने के प्रयास जारी हैं। अपने फ्लैट की खिडक़ी से देखता हूं, तो मुझे यह खेत षड्यंत्र का शिकार प्रतीत होता है। कभी दूर तक खेत ही खेत, फिर शनै:शनै: कटता गया, टुकड़ों में। यह सोचकर कांप जाता हूं कि बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाएगी? चारों ओर घातक नजरें लगी हुई हैं। कभी-कभी यह खेत ड्रेगन चीन की चालों में फंसा तिब्बत, वियतनाम, हॉन्गकॉन्ग सरीखा लगता है। कभी शेरों के झुण्ड से घिरा कोई मासूम मेमना सा।
गौर से देखा तो एकाएक लगा जैसे दिल्ली के चिडिय़ाघर में बाघ 'विजय' के खूंखार पंजों में फंसा मकसूद है, बचाने की मर्मान्तक गुहार लगा रहा है! खेत को देखते-देखते मेरी नजरें सिकुडक़र अपने फ्लैट के इर्द-गिर्द गई। जायजा लिया, तो सैटबैक नदारद पाया। बगल में खाली प्लॉट पर जिस दिन फ्लैट बनेगा, हम खिड़कियों से एक-दूसरे के यहां जाने लगेंगे। दरवाजों की उपयोगिता खत्म हो जाएगी। लेकिन अहम सवाल यह कि हम क्यों जाएंगे भला? हम फ्लैटधारी भी आपस में कितने सिकुड़े हुए हैं। बरसों अगल-बगल, ऊपर-नीचे रहते-रहते एक दूजे को शक्ल से जानने के सिवाय और क्या जानते हैं?
बाहर निकलता हूं, दुनिया सिकुडऩे लगती है। रोड भी पहले जैसी खुली, हवादार नहीं है। अतिक्रमण ने सडक़ की अस्मिता छीन ली है। फुटपाथ पहले सिकुड़ते हैं, फिर कहानी के पात्र की तरह हो जाते हैं- यहां कभी फुटपाथ थे! एक शहर में पार्किंग स्थल ढूंढना तो मंगल पर पानी खोजने की तरह है।
महंगाई ने समोसा, कचौरी की साइज को भी बहुत सिकोड़ा है। रेट अलबत्ता न बढ़ी हो या कम बढ़ी हो, लेकिन भरपाई साइज घटाकर कर ली गई। बिस्किट, चिप्स, नमकीन, दाल सहित अन्य खाद्य सामग्रियों के पैकेट्स पर दृष्टिपात किया, तो पाया रेट यथावत, मगर वजन हल्का हो गया है। अब मुझे हर चीज सिकुड़ी हुई नजर आने लगी।
फिर एकाएक ध्यान आया, पिछले हफ्ते मैंने अंडरवीयर और बनियान खरीदी थी। नम्बर वही अपना 85 था। जब से ये चीजें खुद खरीदने लगा हूं, तब से गरीबों की गरीबी और अपना '85' नम्बर चिरस्थाई है। लेकिन एक हफ्ते में टांके उधडऩे लगे तो आश्चर्य हुआ। पहनने में भी काफी तंग लगीं। शायद नम्बर छोटा आ गया हो। बार-बार देखा, नम्बर दुरुस्त था। फिर ब्रेकिंग न्यूज यह निकली कि शायद अंडरवीयर, बनियान भी सिकुडऩ के शिकार हो गए हैं। जल्द हम भी सिकुडक़र इनके नाप में आने लगेंगे।
इसी बीच एक अनोखी घटना घटित हुई है। लोगों को यह जानकर कौतूहल हुआ कि जयपुर में दिसम्बर के प्रारम्भ में पंखे चलते पाए गए। स्वेटरें, शॉल, कम्बल, मफलर, गर्म टोपियां व्यस्तता के दिनों में बेरोजगार बैठी हैं। कहीं सर्दियां भी न सिकुड़ रही हों? बिलकुल! मौसम विशेषज्ञ कह रहे हैं कि अचानक जयपुर से दिशाएं भटक गई हैं। सो, गर्मी दिसम्बर में भी बनी हुई है। मतलब साफ है, सर्दियों का मौसम भी सिकुड़ रहा है। हवाएं भी सिकुड़ रही हैं। कहीं कुछ सिकुड़ता है, तो कहीं ओर कुछ विस्तार पाता है। अनावश्यक तापमान बढ़ रहा है। ब्लैक होल बढ़ रहा है। ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा बढ़ रही हैं। ओजोन में छेद बड़ा हो रहा है। इसलिए सर्दियों का दौर लघु होना असामान्य घटना नहीं है।
यदि आज हमारे दिमागों को स्कैन किया जाए, तो उनकी सिकुडऩ किस कदर निकलेगी अंदाजा नहीं है। अनुमान से ज्यादा ही संकुचित पाए जाएंगे। दिलों में भी पहले से ज्यादा तंगदिली है। बड़े दिल और खुले दिमाग किसी प्रयोगशाला में तो नहीं बनाए जा सकते हैं न?

November 13, 2014

कांस्टेबल भी संवेदनशील होता है!

एक ही मकान में मेरे पड़ोस में रहने वाला कांस्टेबल दो दिन से अन्यमनस्क है, चुप सा है, अजीब सी खामोशी में लिप्त है, अनिद्रा का शिकार है। मुझे यह देखकर ताज्जुब हो रहा है कि उसे दो दिन की छुट्टी कैसे मिल गई, जबकि बाह्य तौर पर या कहें लाक्षणिक रूप से वह बीमार भी दिखाई नहीं दे रहा। वरना उसे एक-एक दिन की छुट्टी के लिए जयपुर मुख्यालय तक गुहार लगाते मैंने देखा है।
फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि नित्यप्रति सुबह पांच बजे उठकर दौड़ के लिए निकल जाने वाला, छह बजे अपने दोनों बच्चों को उठाकर दैनिक कार्यों से निवृत्त करा, छत पर उन्हें थोड़ी वर्जिश करा, फिर नहा-धुलाकर आठ बजे उनकी स्कूल वैन आने से पहले एक घंटे पढ़ाई भी करवा लेता। दोपहर को भागते-दौड़ते खाना खाने आता, तब भी जाते-जाते बच्चों को कुछ सबक याद करवा जाता। शाम को आता, तब भी मैं उसे बच्चों के साथ पढ़ाई में ही मशगूल देखता। मुझ जैसा घोर आलसी रोज यह देखकर हैरान रह जाता है कि नौ बजते-बजते उधर के पॉर्शन में बत्तियां गुल हो जाती हैं और एक सन्नाटा पसर जाता है। उसे तोड़ते खर्राटे ही सुनाई देते हैं, बस! यह दैनिक क्रिया पिछले चार माह से मैं अनवरत देख रहा हूं। यही वजह है कि सुबह वह परिवार इतना जल्दी उठ पाता है और हम साढ़े सात बजे उठकर थोड़ी शर्मिन्दगी, थोड़ी झेंप के साथ रोज शपथ ग्रहण करते हैं कि कल से हम भी कोशिश करेंगे, लेकिन जल्दी उठेंगे तो तब ना, जब रात 12 बजे सोने की आदत को बदलकर दस बजे बिस्तर पर आने का अभ्यास करेंगे।
खैर, उसकी खामोशी मुझे दो दिन से अखर रही थी। बच्चों से उसे बतियाते भी नहीं सुना। आज सुबह सच भी सामने आ गया। तीन रोज पहले आधी रात को बाइक सवार एक युवक का एक्सीडेंट हुआ। एक्सीडेंट भी ऐसा दर्दनाक कि एक युवा शरीर सडक़ से इस कदर चिपक गया कि घंटों की मशक्कत के बाद खुरचकर ही बोरी में भरा जा सका। उसे खुरचने वाला कोई और नहीं, मेरा पड़ोसी कांस्टेबल ही था। तब से वह सदमे में है। उसकी खोई-खोई सी आंखों में उस मंजर की भयावहता लहरा रही है! जब से यह जाना है, बड़ी बेचैनी है। एक मलाल भी है कि गाहे-बगाहे, हर कहीं वर्दी वाले को देखते ही ठुल्ला, बेईमान, संवेदनहीन, चोर जैसे मुफ्त के तमगे देने की जल्दी में रहने वाले हम लोग कभी सोचते हैं कि एक कांस्टेबल भी संवेदनशील हो सकता है और वह किन परिस्थितियों में काम करता है, छुट्टी शब्द जिसकी नौकरी में नहीं है, सारे पारिवारिक दायित्वों में लगभग उसकी अनुपस्थिति तय रहती है या भागमभाग में निपटाता है। ऊपर से विभाग से लेकर आम जन की गालियों की बारिश अलग! जो लोग, एक घायल को तत्काल अस्पताल पहुंचाने जितनी संवेदना भी नहीं दिखाते, उसके दस मिनट लेट आने को आराम से गरिया सकते हैं, कोस सकते हैं, भीड़ का हिस्सा बनकर पत्थरबाजी, गालीबाजी, ट्रेफिक जाम, नारेबाजी कुछ भी करने के लिए जैसे अधिकृत हैं। हर नौकरी में लेटलतीफी, बंक मारना, ऑफिस से नदारद रहना, मौजूद रहकर भी काम नहीं करना, छुट्टी मारकर साइन करना (आज तू, कल मैं की तर्ज पर) आराम से चलता है, लेकिन पुलिस में ऐसा मुमकिन नहीं, हर्गिज नहीं!
राजस्थान पत्रिका (जयपुर मुख्यालय) में 12 साल पुलिस बीट में काम कर चुका मेरा मित्र ओमप्रकाश शर्मा बार-बार यही कहता है कि 'अगर सिस्टम कहीं बचा हुआ है, तो सिर्फ पुलिस के कारण। बाकी सारे विभाग फेल हो चुके हैं। मैंने सारे विभागों की कार्यप्रणाली नजदीक से देखी है, लेकिन पुलिस की हर आवश्यक जगह मौजूदगी अनिवार्य है और वह वहां होती है। कहीं सडक़ टूटने, बिजली वालों, टेलीफोन वालों की मेहरबानी से सडक़ खुदने, फिर भरने के लिए पलटकर नहीं आने या रोड पर एक पशु के मारे जाने से जाम लग जाए, तो उसे खुलवाने, पशु उठवाने, गड्ढ़े भरवाने के लिए भी एक आम दिमाग में कोसने के लिए पहली छवि जो उभरती है, वह पुलिस की ही होती है। नगर निगम या सडक़ वाले महकमे के लोगों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती।'
ओमप्रकाश के पास गिनाने के लिए एक लंबी फेहरिस्त है, उसे आप चाहकर भी नकार नहीं सकते।
मेरे उससे सहमत होने के पर्याप्त कारण हैं!