संसद में दो दिनी अप्रिय शोरगुल के बाद देश में हृदयभेदी सन्नाटा है। सब कुछ एकदम से खामोश है- सिवाय कुछ दलों में जयचंद चिन्हित और घोषित कर उन्हें पार्टी बदर करने के, कोई बड़ी उल्लेखनीय हरकतें नहीं हो रहीं। हो भी जाएं, तो इसे महज खिसियानी बिल्ली के खम्भा नोचने से अधिक का दर्जा नहीं दिया जाएगा। सारी कुल्लेखनीय हरकतें उन दो दिनों में और उससे पहले हो चुकी हैं। अब और गुंजाइश नहीं।
सत्ता प्रतिष्ठानों के पिछवाड़े अर्थात दस जनपथ में जीत के जश्न की रस्म जरूर है, लेकिन आशंका वहां भी बरकरार है। इसमें जीत जैसा कुछ नजर नहीं आता। जीतकर भी करारी हार सा बोध हर कोई कर सकता है। मुहावरे में कहें तो दस माह की मेहमान सरकार पर अपेक्षाओं का पहाड़ टूट पड़ा है। जो चार साल में एक अपेक्षा पूरी न कर पाई हो, वह दल माह में क्या कर लेगी। इस ताजा हरकत से नेताओं का सरेआम राजफाश जरूर हो गया। राजनीति में सारे ईमान, नैतिकता, आचरण, शुचिता इत्यादि को लेकर अब तक जो भ्रमजाल का तंबू तना हुआ था, वह एक झटके में खुल गया। बेईमानी और भ्रष्टाचार की ऐसी आंधी आई कि संसदीय मर्यादा को यूं हल्के में उड़ा ले गई। एक औसत भारतीय मन अपने इर्द-गिर्द सशंकित सा नंगई महसूस कर रहा है। अफसोस की बात है कि यह नंगई उन बेशर्म मनों द्वारा नहीं महसूसी जा रही, जहां से इसकी अपेक्षा की जाती है।
दो दिन तक टीवी पर आंखें गड़ाए रहे चेहरे मुर्दनी बयां कर रहे है। वहां जो सेंसेक्स से उतार-चढ़ाव नोटिस किए जा रहे थे, वे अब गहरी खामोशी और अफसोस से पुते हैं, भीतर खतरनाक कोलाहल उबल रहा है। उस आंच से व्यथित मन पक रहा है। विश्वास की बर्फ पिघल रही है। आंखें मलने की विवशता इसलिए है कि क्या यह ड्रामा वास्तविक था या कोई बड़ी दुर्घटना? जिसके घटित हो जाने के बाद मन इतना खिन्न कि अब वह कोई और कल्पनामयी आकांक्षा पाल सकेगा या नहीं? कमजोर हिन्दुस्तानी मनों पर टनों अवसाद लद गए हैं।
अब यह मानना ही पड़ेगा कि संसदीय मर्यादा का हिमालयी शिखर झुक गया है। भरोसे की बची-खुची बर्फ को पिघलने में दो दिन भी नहीं लगे। जिस भरोसे को नेहरू, शास्त्री, पटेल जैसे नेताओं ने कायम किया था। अब वहां नंगई है सिर्फ नंगई। लाज का वस्त्र उघड़ चुका। भरोसे का नाड़ा खुल गया। ढांपने की फिक्र भी नहीं है किसी को। वह इसीलिए नहीं है कि अब आचरण में शुचिता कोई मसला नहीं रह गया है। छोड़ आए उन गलियों को वाला मामला हो गया है, जहां शुचिता के झंडे गड़े रहते थे। एक सूत्री मसला सिर्फ सत्ता है और उसे किसी भी सूरत में पा लेना ही परम लक्ष्य की प्राप्ति है। यही किया सबने मिलकर। गिरावट का आलम इस कदर हुआ है कि इस हादसे के बाद अब कोई साधारण व्यक्ति सत्ता की गलियों में कदम रखने की नहीं सोच सकता। दहलीज पर प्रथम कदम ही उसकी आत्मा को झिंझोड़ देगा।
विश्वास मत के नाम पर अविश्वास जीत लिया गया। बहुत बुरी खबर है। अब आगे के रास्ते किस अंजाम की तरफ ले जाने वाले हैं, आप-हम सोचकर सिहर सकते हैं।
July 24, 2008
July 22, 2008
मंगल का हो गया मुंह काला
मंगल का मुंह काला आखिर कर ही डाला। यही तो मैंने चार दिन पहले लिखा था। आपने भी लिखा था। सबने यही लिखा था। सबको अंदेशा था। होता क्यों नहीं? जो हो रहा था, उसे तो होकर रहना ही था। अब आप क्या करेंगे? दो दिन से टीवी से चिपके हैं, आप, हम, समूचा देश। झुकी हुई गर्दनें, विस्फारित सी आंखें, शर्मिन्दगी से भरा हुआ माहौल। थूक देने को जी चाहता है इन मनहूस चेहरों पर। जिन्हें आप और हमने ही मालाएं पहनाईं थी। कितनी मक्कारी बयां हो रही है इन चेहरों पर। जुबां पर जो है, वह आंखों में नहीं। आंखों में जो है, वह चेहरों पर नहीं। जो होना चाहिए, वह कहीं नहीं। जो नहीं होना चाहिए, वह हर तरफ है। कोई अछूता नहीं। दूध से नहाया हुआ हर शख्स कलुषित है भीतर गहरे तक। खामोश है पूरा देश।
बस, संसद में शोरगुल है।
धिक्कार। मगर किसे? खुद को ही.......................।
बस, संसद में शोरगुल है।
धिक्कार। मगर किसे? खुद को ही.......................।
July 12, 2008
बारिश की एक बूंद और हजार अर्थ
भारत जैसे कृषि प्रधान देश में मानसून मेहमान की तरह है। एक ऐसा मेहमान जिसके आगमन का सभी को बेसब्र इन्तजार रहता है। अक्सर इसकी देरी जनमानस को बेचैन कर देती है। इसको लेकर उनकी अत्कंठा छुपाए नहीं छुपती। और जब यह आता है, तो इसकी फुहारें प्राणी वृन्द को हुलसित-हर्षित कर देती है। आज रात से ही बारिश हो रही थी। सुबह घूमने के इरादे से उठा भी तो बारिश की टपाटप सुन वापस दुबकने का बहाना मिल गया। बूंदों की लोरी ने चैन की नींद सुला दिया। आंख खुली तो घड़ी की सुई नौ पर थी। गीले अखबार में कोई अपील नहीं थी कि उसे पढ़ा जाए। बस, पढ़ने की विवशता के चलते सरसरी दृष्टि डाल बरामदे में बैठ गया। बूंदो को निहारना काफी सुकून भरा लगा। आज ऑफिस भी भीगते हुए ही जाने का मन हुआ। मोटरसाइकिल धीरे-धीरे चलाते हुए, बारिश के खयालों में खोया ऑफिस पहुंचा।
कम, तेज होती बारिश की तरह ही मन में खयाल आ-जा रहे थे। आखिर बारिश में ऐसा क्या जादू है? बूंदों में जाने कैसी चुम्बकीय शक्ति है कि हर कोई अन्तर्मन से बंध जाता है। लेकिन सबके लिए बारिश के अपने-अपने मायने हैं, अपने-अपने अर्थ हैं। किसान जहां आसमान में आए श्वेत-श्याम बादलों का मैसेज पढ़कर खाद-बीज के इन्तजाम में जुटता है और खुशी पालता है कि चलो, इस बार तो सूखे से मुक्ति मिलेगी। आगे क्रमवार बारिश के साथ उसके खेत भी हरियाली के जरिए अपनी खुशी जाहिर करते हैं।
सरकारों के लिए किसान की इस खुशी का कोई खास अर्थ नहीं। सरकार और बादलों का संयोग यह है कि अच्छी बारिश उसके लिए किसान के प्रति दायित्वों से मुक्ति का पर्व है। समय पर खाद-बीज का उपलब्ध नहीं होना सरकारों की बेरुखी का ऐतिहासिक दस्तावेज है।
सरकारी दफ्तरों के लिए भी बारिश के अपने-अपने मजे हैं। वे इसका अपने हिसाब से मैसेज पढ़ते हैं और बूंदो को अर्थ देते हैं। अफसर और किसान की खुशी में पाताल फर्क है। किसान की देह जहां अगले छह माह मेहनत की खुशी में गंधाती है, वहीं अफसर की देह से हर एक बूंद को कैश में बदलने को ललक फूटती है। सड़कों में हुए गहरे घाव, उसके लिए और उसके मातहत कर्मचारियों के लिए मलहम का काम करते हैं। या वे कामना करते हैं कि इस बार सड़क पानी में बह जाए। एक जोरदार बारिश हो और सड़क डामर, पत्थरों समेत पूरी तरह धुल जाए। तो उनके भी कई पाप धुल जाएं। ठेकेदार आसमान में बादल देख, नए टेण्डर की खुशी में झूमता है। उसके मन में बेशर्म इरादे उगते हैं, और सरकारी कारिन्दों के ड्राइंग रूम में ये इरादे उनकी आंखों में नए अर्थ पैदा करते हैं।
बारिश में कागजों की नाव चलती हैं। कागजों में चलती हैं। कागजों में ही इन्तजाम होते हैं। बारिश का बाढ़ की शक्ल में आया एक रैला उन कागजों की पोल खोल देता है।
इस मौसम में सरकारी दफ्तरों का हरियाली प्रेम भी प्रस्फूटित होता है। उनके लगाए पौधे भले ही न फूटें, लेकिन उनके मन में हरियाली के पूरे बाग फूट पड़ते हैं। पौधे फाइलों में आंकड़ों की शक्ल अख्तियार कर लेते हैं और बारिश के वेग के साथ शून्य आकार में बढ़ते जाते हैं। बारिश गुजरने के साथ सड़कों के किनारे वही हालात, बाग, नर्सरियों में वही वीरानी, लेकिन सरकारी कारिन्दों के महकते लॉन पड़ौसियों को भी खबर कर देते हैं।
इस प्रकार बारिश के चार माह भारतीय जीवन को नए अर्थ दे जाते हैं। पढ़ने वाले इसे बखूबी पढ़ते हैं, और नए अर्थ गढ़ने वाले भी कमतर नहीं।
कम, तेज होती बारिश की तरह ही मन में खयाल आ-जा रहे थे। आखिर बारिश में ऐसा क्या जादू है? बूंदों में जाने कैसी चुम्बकीय शक्ति है कि हर कोई अन्तर्मन से बंध जाता है। लेकिन सबके लिए बारिश के अपने-अपने मायने हैं, अपने-अपने अर्थ हैं। किसान जहां आसमान में आए श्वेत-श्याम बादलों का मैसेज पढ़कर खाद-बीज के इन्तजाम में जुटता है और खुशी पालता है कि चलो, इस बार तो सूखे से मुक्ति मिलेगी। आगे क्रमवार बारिश के साथ उसके खेत भी हरियाली के जरिए अपनी खुशी जाहिर करते हैं।
सरकारों के लिए किसान की इस खुशी का कोई खास अर्थ नहीं। सरकार और बादलों का संयोग यह है कि अच्छी बारिश उसके लिए किसान के प्रति दायित्वों से मुक्ति का पर्व है। समय पर खाद-बीज का उपलब्ध नहीं होना सरकारों की बेरुखी का ऐतिहासिक दस्तावेज है।
सरकारी दफ्तरों के लिए भी बारिश के अपने-अपने मजे हैं। वे इसका अपने हिसाब से मैसेज पढ़ते हैं और बूंदो को अर्थ देते हैं। अफसर और किसान की खुशी में पाताल फर्क है। किसान की देह जहां अगले छह माह मेहनत की खुशी में गंधाती है, वहीं अफसर की देह से हर एक बूंद को कैश में बदलने को ललक फूटती है। सड़कों में हुए गहरे घाव, उसके लिए और उसके मातहत कर्मचारियों के लिए मलहम का काम करते हैं। या वे कामना करते हैं कि इस बार सड़क पानी में बह जाए। एक जोरदार बारिश हो और सड़क डामर, पत्थरों समेत पूरी तरह धुल जाए। तो उनके भी कई पाप धुल जाएं। ठेकेदार आसमान में बादल देख, नए टेण्डर की खुशी में झूमता है। उसके मन में बेशर्म इरादे उगते हैं, और सरकारी कारिन्दों के ड्राइंग रूम में ये इरादे उनकी आंखों में नए अर्थ पैदा करते हैं।
बारिश में कागजों की नाव चलती हैं। कागजों में चलती हैं। कागजों में ही इन्तजाम होते हैं। बारिश का बाढ़ की शक्ल में आया एक रैला उन कागजों की पोल खोल देता है।
इस मौसम में सरकारी दफ्तरों का हरियाली प्रेम भी प्रस्फूटित होता है। उनके लगाए पौधे भले ही न फूटें, लेकिन उनके मन में हरियाली के पूरे बाग फूट पड़ते हैं। पौधे फाइलों में आंकड़ों की शक्ल अख्तियार कर लेते हैं और बारिश के वेग के साथ शून्य आकार में बढ़ते जाते हैं। बारिश गुजरने के साथ सड़कों के किनारे वही हालात, बाग, नर्सरियों में वही वीरानी, लेकिन सरकारी कारिन्दों के महकते लॉन पड़ौसियों को भी खबर कर देते हैं।
इस प्रकार बारिश के चार माह भारतीय जीवन को नए अर्थ दे जाते हैं। पढ़ने वाले इसे बखूबी पढ़ते हैं, और नए अर्थ गढ़ने वाले भी कमतर नहीं।
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