December 02, 2014

सिकुड़ती जमीन
- सुरजीत सिंह
वह पहले खेत हुआ करता था। देहयष्टि से भी और अपने गर्भ में उगाने वाली फसलों के लिहाज से भी। महज पांच-दस साल का संक्षिप्त सा समय गुजरा है और अब वह सिकुडक़र प्लॉट का एक टुकड़ा भर रह गया है। चारों ओर ऊंचे, कई मंजिला फ्लैट, मकान, बिल्डिंग बन गए। फॉर्म हाउस अस्तित्व में आ गए। आजकल शहरों के आस-पास फॉर्म हाउस क्रांति में तेजी हैं, यह पैसे वालों की मानसिक अय्याशियों का नतीजा हैं, जिनमें फसलें नहीं उगतीं, रिटर्न के लालच में निवेश के मनी प्लांट उगाए जाते हैं।
खेत के दूसरी तरफ कोने में किसी दिमाग की फूली हुई नसों के जैसा दुकानों का गुच्छा सा उभर आया है। पास में पानी की विशाल टंकी, बगल में फास्टफूड की दुकानें, डिपार्टमेंटल स्टोर, तीन तरफ फ्लैट और बिल्डिंगें! बीच में यह सिकुड़ा हुआ खेत! ताज्जुब है इसका बचे रहना और इससे बड़ा ताज्जुब है कि इसमें किसान ने अब भी थोड़े से टमाटर, मिर्च, बैंगन लगाने की जिद पाल रखी है। गोया खेत की आत्मा को जीवित रखने के प्रयास जारी हैं। अपने फ्लैट की खिडक़ी से देखता हूं, तो मुझे यह खेत षड्यंत्र का शिकार प्रतीत होता है। कभी दूर तक खेत ही खेत, फिर शनै:शनै: कटता गया, टुकड़ों में। यह सोचकर कांप जाता हूं कि बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाएगी? चारों ओर घातक नजरें लगी हुई हैं। कभी-कभी यह खेत ड्रेगन चीन की चालों में फंसा तिब्बत, वियतनाम, हॉन्गकॉन्ग सरीखा लगता है। कभी शेरों के झुण्ड से घिरा कोई मासूम मेमना सा।
गौर से देखा तो एकाएक लगा जैसे दिल्ली के चिडिय़ाघर में बाघ 'विजय' के खूंखार पंजों में फंसा मकसूद है, बचाने की मर्मान्तक गुहार लगा रहा है! खेत को देखते-देखते मेरी नजरें सिकुडक़र अपने फ्लैट के इर्द-गिर्द गई। जायजा लिया, तो सैटबैक नदारद पाया। बगल में खाली प्लॉट पर जिस दिन फ्लैट बनेगा, हम खिड़कियों से एक-दूसरे के यहां जाने लगेंगे। दरवाजों की उपयोगिता खत्म हो जाएगी। लेकिन अहम सवाल यह कि हम क्यों जाएंगे भला? हम फ्लैटधारी भी आपस में कितने सिकुड़े हुए हैं। बरसों अगल-बगल, ऊपर-नीचे रहते-रहते एक दूजे को शक्ल से जानने के सिवाय और क्या जानते हैं?
बाहर निकलता हूं, दुनिया सिकुडऩे लगती है। रोड भी पहले जैसी खुली, हवादार नहीं है। अतिक्रमण ने सडक़ की अस्मिता छीन ली है। फुटपाथ पहले सिकुड़ते हैं, फिर कहानी के पात्र की तरह हो जाते हैं- यहां कभी फुटपाथ थे! एक शहर में पार्किंग स्थल ढूंढना तो मंगल पर पानी खोजने की तरह है।
महंगाई ने समोसा, कचौरी की साइज को भी बहुत सिकोड़ा है। रेट अलबत्ता न बढ़ी हो या कम बढ़ी हो, लेकिन भरपाई साइज घटाकर कर ली गई। बिस्किट, चिप्स, नमकीन, दाल सहित अन्य खाद्य सामग्रियों के पैकेट्स पर दृष्टिपात किया, तो पाया रेट यथावत, मगर वजन हल्का हो गया है। अब मुझे हर चीज सिकुड़ी हुई नजर आने लगी।
फिर एकाएक ध्यान आया, पिछले हफ्ते मैंने अंडरवीयर और बनियान खरीदी थी। नम्बर वही अपना 85 था। जब से ये चीजें खुद खरीदने लगा हूं, तब से गरीबों की गरीबी और अपना '85' नम्बर चिरस्थाई है। लेकिन एक हफ्ते में टांके उधडऩे लगे तो आश्चर्य हुआ। पहनने में भी काफी तंग लगीं। शायद नम्बर छोटा आ गया हो। बार-बार देखा, नम्बर दुरुस्त था। फिर ब्रेकिंग न्यूज यह निकली कि शायद अंडरवीयर, बनियान भी सिकुडऩ के शिकार हो गए हैं। जल्द हम भी सिकुडक़र इनके नाप में आने लगेंगे।
इसी बीच एक अनोखी घटना घटित हुई है। लोगों को यह जानकर कौतूहल हुआ कि जयपुर में दिसम्बर के प्रारम्भ में पंखे चलते पाए गए। स्वेटरें, शॉल, कम्बल, मफलर, गर्म टोपियां व्यस्तता के दिनों में बेरोजगार बैठी हैं। कहीं सर्दियां भी न सिकुड़ रही हों? बिलकुल! मौसम विशेषज्ञ कह रहे हैं कि अचानक जयपुर से दिशाएं भटक गई हैं। सो, गर्मी दिसम्बर में भी बनी हुई है। मतलब साफ है, सर्दियों का मौसम भी सिकुड़ रहा है। हवाएं भी सिकुड़ रही हैं। कहीं कुछ सिकुड़ता है, तो कहीं ओर कुछ विस्तार पाता है। अनावश्यक तापमान बढ़ रहा है। ब्लैक होल बढ़ रहा है। ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा बढ़ रही हैं। ओजोन में छेद बड़ा हो रहा है। इसलिए सर्दियों का दौर लघु होना असामान्य घटना नहीं है।
यदि आज हमारे दिमागों को स्कैन किया जाए, तो उनकी सिकुडऩ किस कदर निकलेगी अंदाजा नहीं है। अनुमान से ज्यादा ही संकुचित पाए जाएंगे। दिलों में भी पहले से ज्यादा तंगदिली है। बड़े दिल और खुले दिमाग किसी प्रयोगशाला में तो नहीं बनाए जा सकते हैं न?

November 13, 2014

कांस्टेबल भी संवेदनशील होता है!

एक ही मकान में मेरे पड़ोस में रहने वाला कांस्टेबल दो दिन से अन्यमनस्क है, चुप सा है, अजीब सी खामोशी में लिप्त है, अनिद्रा का शिकार है। मुझे यह देखकर ताज्जुब हो रहा है कि उसे दो दिन की छुट्टी कैसे मिल गई, जबकि बाह्य तौर पर या कहें लाक्षणिक रूप से वह बीमार भी दिखाई नहीं दे रहा। वरना उसे एक-एक दिन की छुट्टी के लिए जयपुर मुख्यालय तक गुहार लगाते मैंने देखा है।
फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि नित्यप्रति सुबह पांच बजे उठकर दौड़ के लिए निकल जाने वाला, छह बजे अपने दोनों बच्चों को उठाकर दैनिक कार्यों से निवृत्त करा, छत पर उन्हें थोड़ी वर्जिश करा, फिर नहा-धुलाकर आठ बजे उनकी स्कूल वैन आने से पहले एक घंटे पढ़ाई भी करवा लेता। दोपहर को भागते-दौड़ते खाना खाने आता, तब भी जाते-जाते बच्चों को कुछ सबक याद करवा जाता। शाम को आता, तब भी मैं उसे बच्चों के साथ पढ़ाई में ही मशगूल देखता। मुझ जैसा घोर आलसी रोज यह देखकर हैरान रह जाता है कि नौ बजते-बजते उधर के पॉर्शन में बत्तियां गुल हो जाती हैं और एक सन्नाटा पसर जाता है। उसे तोड़ते खर्राटे ही सुनाई देते हैं, बस! यह दैनिक क्रिया पिछले चार माह से मैं अनवरत देख रहा हूं। यही वजह है कि सुबह वह परिवार इतना जल्दी उठ पाता है और हम साढ़े सात बजे उठकर थोड़ी शर्मिन्दगी, थोड़ी झेंप के साथ रोज शपथ ग्रहण करते हैं कि कल से हम भी कोशिश करेंगे, लेकिन जल्दी उठेंगे तो तब ना, जब रात 12 बजे सोने की आदत को बदलकर दस बजे बिस्तर पर आने का अभ्यास करेंगे।
खैर, उसकी खामोशी मुझे दो दिन से अखर रही थी। बच्चों से उसे बतियाते भी नहीं सुना। आज सुबह सच भी सामने आ गया। तीन रोज पहले आधी रात को बाइक सवार एक युवक का एक्सीडेंट हुआ। एक्सीडेंट भी ऐसा दर्दनाक कि एक युवा शरीर सडक़ से इस कदर चिपक गया कि घंटों की मशक्कत के बाद खुरचकर ही बोरी में भरा जा सका। उसे खुरचने वाला कोई और नहीं, मेरा पड़ोसी कांस्टेबल ही था। तब से वह सदमे में है। उसकी खोई-खोई सी आंखों में उस मंजर की भयावहता लहरा रही है! जब से यह जाना है, बड़ी बेचैनी है। एक मलाल भी है कि गाहे-बगाहे, हर कहीं वर्दी वाले को देखते ही ठुल्ला, बेईमान, संवेदनहीन, चोर जैसे मुफ्त के तमगे देने की जल्दी में रहने वाले हम लोग कभी सोचते हैं कि एक कांस्टेबल भी संवेदनशील हो सकता है और वह किन परिस्थितियों में काम करता है, छुट्टी शब्द जिसकी नौकरी में नहीं है, सारे पारिवारिक दायित्वों में लगभग उसकी अनुपस्थिति तय रहती है या भागमभाग में निपटाता है। ऊपर से विभाग से लेकर आम जन की गालियों की बारिश अलग! जो लोग, एक घायल को तत्काल अस्पताल पहुंचाने जितनी संवेदना भी नहीं दिखाते, उसके दस मिनट लेट आने को आराम से गरिया सकते हैं, कोस सकते हैं, भीड़ का हिस्सा बनकर पत्थरबाजी, गालीबाजी, ट्रेफिक जाम, नारेबाजी कुछ भी करने के लिए जैसे अधिकृत हैं। हर नौकरी में लेटलतीफी, बंक मारना, ऑफिस से नदारद रहना, मौजूद रहकर भी काम नहीं करना, छुट्टी मारकर साइन करना (आज तू, कल मैं की तर्ज पर) आराम से चलता है, लेकिन पुलिस में ऐसा मुमकिन नहीं, हर्गिज नहीं!
राजस्थान पत्रिका (जयपुर मुख्यालय) में 12 साल पुलिस बीट में काम कर चुका मेरा मित्र ओमप्रकाश शर्मा बार-बार यही कहता है कि 'अगर सिस्टम कहीं बचा हुआ है, तो सिर्फ पुलिस के कारण। बाकी सारे विभाग फेल हो चुके हैं। मैंने सारे विभागों की कार्यप्रणाली नजदीक से देखी है, लेकिन पुलिस की हर आवश्यक जगह मौजूदगी अनिवार्य है और वह वहां होती है। कहीं सडक़ टूटने, बिजली वालों, टेलीफोन वालों की मेहरबानी से सडक़ खुदने, फिर भरने के लिए पलटकर नहीं आने या रोड पर एक पशु के मारे जाने से जाम लग जाए, तो उसे खुलवाने, पशु उठवाने, गड्ढ़े भरवाने के लिए भी एक आम दिमाग में कोसने के लिए पहली छवि जो उभरती है, वह पुलिस की ही होती है। नगर निगम या सडक़ वाले महकमे के लोगों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती।'
ओमप्रकाश के पास गिनाने के लिए एक लंबी फेहरिस्त है, उसे आप चाहकर भी नकार नहीं सकते।
मेरे उससे सहमत होने के पर्याप्त कारण हैं!

August 26, 2014

आमिर का 'ट्रांजिस्टर '

- सुरजीत सिंह
सर्पाकार सी लेटी हुई रेल पटरी है। नॉस्टेल्जिया सा ट्रांजिस्टर है। थोड़े पुराने, ज्यादा नए आमिर हैं। सद्यजात खान है। आधुनिक संस्कार सी देह है। कुल लब्बोलुआब यह कि पटरियों के बीचोंबीच आमिर खान नग्न खड़े हैं, सपाट, भाव शून्य, वस्त्रहीन! हाय! सारी शर्म-हया छोड़...तौबा, तौबा!! वे इंडिया की नजर में न्यूड हैं और भारत की दृष्टि में नंग-धड़ंग। वर्तमान के मुहाने पर खड़े बेशर्म भविष्य की तरह। बदन पर लज्जा वसन नहीं है। सो, लाज किसी तरह ट्रांजिस्टर से ढांपे हैं। कसी हुई नग्न देह बाजार की प्रत्यंचा पर चढ़ी हुई है और ट्रांजिस्टर जैसे लगभग शेष रह गए सांस्कृतिक अवशेष की तरह है, जो आधुनिकता की आंधी से अंतिम मुकाबला लड़ रहा है।
यह वह आत्मलीन दौर है, जिसमें अनावृत्ति, निवृत्ति, मुक्ति ही परफेक्शन की निशानी है। जिसको बाजार की सुनामी ने उघाड़ दिया, उसे दुनिया भर के मॉडर्न और अपार रेंज वाले वस्त्र भी क्या ढांपने की कूव्वत रखते होंगे? उलटबांसियों के इस युग में जो सघोष जितना वस्त्राच्छादित, उतना ही अनावृत्त! जी हां, यहां माल बिकता है! आमिर भी कुछ बेचने निकले हैं। वे स्वयं माल की तरह प्रस्तुत हैं। तसल्लीबख्श यह है कि आमिर के हाथ में ट्रांजिस्टर है। अगर हाथ में लोटा होता, तो वे सब पटरी वाले हाहाकारी चिंता में पड़े होते, जिनका सुबह-सुबह रेल की पटरियों पर लोटा चिंतन का जन्मसिद्ध अधिकार है। आमिर के ट्रांजिस्टर ने उन्हें दुविधा मुक्त कर दिया है। लेकिन आमिर की तरह ही अनुत्तरित सवाल यह खड़ा है कि आमिर यूं क्यूं खड़े हैं? उनकी दशा, दिशा क्या है? कहा जा रहा है आमिर 'पीके '  नग्न खड़े हैं। पिया हुआ बहकने को थोड़ा स्वतंत्र होता है। जबकि यहां तो अनपिये लोग, पूरे होशोहवाश वाले 'बहके ' हुए हैं, फु ल नंगई मचाने पर तुले हैं।
भरे बाजार नीलामी हेतु प्रस्तुत हैं:- कोई उनके सारे वस्त्र ले जाए। सारी लाज ले जाए। बचा-खुचा चरित्र ले जाए। ईमान ले जाए। संस्कार ले जाए। नैतिकता ले जाए। कायदों से शर्म-लिहाज ले जाए। पहचान ले जाए। पुरखों की कमाई इज्जत-आबरू ले जाए। बदले में ढेर सारी बदनामी दे जाए। बेईमानी दे जाए। अहा, वह ऊंचाइयां दे जाए, जो रातों-रात चमकता कंदील बना दे, कंगूरा बना दे, सेलिब्रिटी स्टेटस दे दें।
उचककर गौर से देखें तो आमिर के पीछे विराट भारत खड़ा है। नंग धड़ंग। पूर्णत: अनावृत्त। स्वत्व से निवृत्त। मूल से रहित। लालच की पटरी पर सवार। नेता चरित्र से। नई पीढ़ी संस्कारों से। परिवार परम्परा से। समाज मूल्यों से। राष्ट्र जड़ों से। राज नीति से। अफसर ईमान से। बाबू काम से। बाबा संतई से। हीरोइन वस्त्रों से। एक्टर एक्टिंग से। फिल्में कहानी से। साहित्य उद्देश्य से। कार्य कारण से। नदियां किनारों से। सागर तट से। मौसम मियाद से। हवाएं दिशा से। माटी महक से। एनआरआई वतन से। पुरुष पौरुष से। औरत हया से। युवा युवकोचित कर्म से। पढ़ाई सिद्धांत से। गुरु पढ़ाई से। शिक्षण गांभीर्य से। विश्वविद्यालय शोध से। प्रोफेसर अध्यापन से। खिलाड़ी खेल भावना से। सरकार दायित्वों से। संसद मर्यादा से। पुलिस संवेदना से। कानून पालना से। आंखें पानी से। शरीर आत्मा से। अंतस जमीर से। इच्छाएं संयम से। आदतें व्यवहार से। भाव पहुंच से। वस्तुएं क्रय शक्ति से। गरीब जिंदगी से। परवरिश पोषण से। उफ्, बड़ी लंबी फेहरिस्त है।

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- सुरजीत सिंह,
36, रूप नगर प्रथम, हरियाणा मैरिज लॉन के पीछे,
महेश नगर, जयपुर -302015
(मो. 09001099246)