April 14, 2008

...गर मनमोहनजी सब्जी बेचने निकलें?

आजकल कई उलटबांसियां सी हो रही हैं। कई बांस उलटे बरेली को हैं। कहां शाहरुख खान करोड़ों कमाने के चक्कर में क्रिकेट के चक्कर में फंस बैठे। उनके आईपीएल के टिकट नहीं बिक रहे। कोलकाता टीम के टिकट बेचते-बेचते पता लग गया है कि टिकट बेचना कोई डॉयलोग बोलने जैसा नहीं है। शुरू से खूब मशक्कत कर रहे हैं। पिक्चर-विक्चर छोड़ पिछले दिनों से लोगो, डे्स, हेलमेट वगैरह के अनावरण में भी खूब व्यस्त रहे। अब टिकट भी पूरे अभिनय के साथ बेचने निकले। हें, हें, हें, आ...पने अपनी फिल्में तो खूब देखी होंगी, अब देखिए अपना क्रिकेट का सुपर-डुपर हिट जलवा। इसमें क्रिकेट भी होगा, एक्टिंग भी होगी। क्रिकेट नहीं भी हुआ, तो गांगुली तो जरूर होगा। आपको जो पसंद आए, देखें। पहले इस्तेमाल करें, फिर विश्वास करें। अरे भाई साब, क्या करते हैं। बोहनी का टाइम है। टिकट खरीद लो। यह आपसे शाहरुख कह रहा है। अरे, उधर कहां से निकल लिए। इधर आओ ना, इतनी सस्ती, फिर भी इतनी बेरुखी। मुंह मोड़े चले जा रहे हैं। अरे ये क्या करते हो, कोई तो आओ। भइया मैं तो यूं बर्बाद हो जाऊंगा। (...और इस तरह शाहरुख के टिकट आशानुसार नहीं बिके। सुपर स्टार निराश हो गया।)
वैसे इस टिकटमारी में कई धांसू सीन बन रहे हैं। उधर, प्रीति जिंटा खुद मोहाली में दुकान पर शानदार काउंटर जमा कर बैठी हैं। आइए, आइए, मैं खुद यानी हीरोइन प्रीति जिंटा टिकट बेचने निकली हूं। यह कोई आलू, तरकारी नहीं है, जो यूं मुंह मोड़कर निकल जाओ। शुद्ध, खांटी क्रिकेट का टिकट है। ले जाइए, सब्जी से भी सस्ती। दाल-चावल, चीनी से भी सस्ती। राम कसम इतने किफायती दामों में पिक्चर का टिकट भी नहीं मिलेगा। यहां आपको क्रिकेट का टिकट मिल रहा है। आइए, पसंद कीजिए और ले जाइए। ५०, १००, १५०, २०० जो भी मन को भाए, ले जाएं। खुद भी लें औरों को भी दिलाएं। एक बार लेंगे, बार-बार आएंगे। नहीं लेंगे, पछताएंगे। इसमें सब कुछ होगा। क्रिकेट भी होगी, छक्के भी होंगे। क्रिकेट न भी हुई तो बिल्लो रानी का शानदार डांस जरूर होगा। महंगाई से निराश हैं, तो मैदान में आकर मन बहलाएं। आपकी कसम, यह झूठ नहीं है। इस तरह प्रीति जिंटा दोपहर तक बैठीं। पर टिकट क्या हुई, सब्जी हो गई। नहीं बिकी। खुद के बैठने के लिहाज से टिकट नहीं निकले। दर्शक न जाने क्या भाव से हो गए हैं, जो पहुंच से एकदम बाहर। या शेयर सूचकांक से हो ऊपर चढ़ गए हैं। हीरोइन को कित्ती चिरौरी करनी पड़ रही है कि भइया नीचे उतरो, ठिकाने पर लौटो। अभी विजय माल्या, मुकेश अम्बानी वगैरह भी शुभ मुहूर्त देख शटर उठाने वाले हैं। अम्बानी को तो सब्जी वगैरह बेचते-बेचते अच्छा-खासा सा अनुभव हो गया। थोक के साथ खुदरा में भी बेच लेंगे। और भी कई घराने खुदरा पर उतर आए हैं।
इससे एक बात तो साफ हुई। इन लोगों को भी पता लगा गया कि टिकट वगैरह बेचना कितना कठिन काम है। वैसे भी महंगाई के जमाने में पब्लिक टिकट कैसे खरीदे। आटे-दाल के भाव से पगलाया आम आदमी टिकट की कैसे सोचे। वह सब्जी मण्डी की ओर निकलने का साहस जुटाए कि मैच देखने के मंसूबे पाले। भाव सुनकर गश खा जाने वाला आदमी टिकट खरीदने के लिए होश कहां से लाए। उसके लिए काफी विकट सी चीज हो गई है टिकट। यह तो शरद पंवार टाइप नेताओं के बस की ही बात है, जो महंगाई के जमाने में कृषि मंत्रालय भी संभाल रहे हैं और क्रिकेट, विश्व क्रिकेट भी।
यदि एक बार मनमोहन सिंह भी सब्जी की दुकान खोल लें, तो पता चल जाए कि सरकार चलाने और सब्जी बेचने में कितना फर्क है। सरकार भले ही, तमाम लेफ्ट, राइट, फ्रन्टबाजी के बावजूद चल जाए, सब्जी बेचना कोई सरकारों का खेल नहीं।

2 comments:

Manas Path said...

ये सब्जी भी बेचेंगे तो विश्व बैक के लिए.

रवीन्द्र प्रभात said...

वैसे इनकी सब्जियों के दाम ऊंचे मिलेंगे !